काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
पृष्ठ 64, कुल 270 में से
संदर्भ में पढ़ें३।३१] १.२ व्यपेत घ. चतुष्पाद आदि यमक ४१
२७. उदितैरन्यपुष्टानामारुतैर् मे हृतं मनः ।
उदितैरपि ते दूति, मारुतैरपि दक्षिणैः ।। ३१ ।।
२७. हे दूति, मेरा मन (क) कोयलोंकी उठी तानोंने और (ख) तुम्हारी
बातोंने तथा (ग) दक्षिणी बयारोंने हर लिया है ।। ३१ ।
बाद भला रमण प्रसन्न क्यों न होगा ? 'रमण' का प्रयोग भी अवसरके अनु-
कूल किया है ।
श्लोकके पूर्वार्धके दोनों चरणोंके आदिमें 'सुदारम' चार वर्णोंके समुदाय
की और उत्तरार्धके दोनों चरणोंके आदिमें 'मद्रभ्र' (तीन वर्णोंके समुदाय) की
व्यवहित आवृत्ति की गई है । इस प्रकार यहाँ यमक चारों पादोंमें है । तथापि
पूर्वार्धमें अन्य वर्णसमुदायकी और उत्तरार्धमें अन्य वर्णसमुदायकी आवृत्ति
होनेसे यहाँ अर्धसम चतुष्पाद व्यपेत यमक है । ये सब आवृत्ति सुकर हैं ।
उच्चारण और अवबोध, दोनों स्तरोंपर किसी प्रकारकी क्लिष्टता इनमें नहीं
है । अतः कोमल रसोंकी अभिव्यक्तिमें भी साधक है, बाधक नहीं ।
अन्वीतम्—अनु + √ ई + क्त (भावे) । यह √ ई कुछ आचार्योंके मतमें
इट किट कटी गतौ (भ्वा० ६।२६-३१) में प्रश्लिष्ट है ।¹ सेट् अजन्त
धातुओंमें अपठित होनेसे यह अनिट् है² ।। ३० ।।
२७ (२. घ. ३.) व्यपेत सुकर चतुष्पादादि यमकका एक अन्य (विषम)
प्रकार—इस श्लोकमें रतिके उद्दीपन विभावोंका वर्णन किया गया है । (क)
वसन्तमें आमोंमें बौर आते ही कोयलोंने मीठी तान छेड़ी ही थी कि मनमें
प्रेम अँगड़ाई लेने लगा । (ख) तभी सौभाग्यसे प्रियाका सन्देश लेकर दूती
आ गई । उसकी मीठी बातोंसे मन मुग्ध हो ही रहा था कि (ग) तभी
दक्षिणी बयार बहने लगी । तब मन कहाँ काबूमें रहने वाला था ! इस
प्रकार रतिकी एकके बाद एक उद्दीपन वस्तुओंको इस श्लोकमें प्रस्तुत
किया गया है । इसके अतिरिक्त एक नामीभूत क्रियापद 'हृतं' का सम्बन्ध
१. सिद्धान्तकौमुदी, भ्वादि : इट, किट, कटी गतौ । केचित्तु... अन्ते च
'इ-ई' इति प्रश्लिष्य 'अयति...अयांचकार' इत्याद्युदाहरन्ति । विशेषार्थ
हमारी भवतोषिणी, पृष्ठ ३३४-३३६ देखें ।
२. ऊदृदन्तैर्यौति-रु-क्ष्णु-शीङ्-स्नु-नु-क्षु-श्वि-डीङ्-श्रिभिः ।
वृङ्-वृञ्भ्यां च विनैकाचोऽजन्तेषु निहताः स्मृताः ।। भ्वादि, पृष्ठ २०३