काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० काव्यदर्श [३।३०
२६. मुदा रमणमन्वितमुदारमणिभूषणाः ।
मदभ्रमद्दृशः कर्तुमदभ्रजघनाः क्षमाः¹ ॥ ३० ॥
२६. (क) बड़ी-बड़ी मणियोंके गहनों वाली, (ख) मदके कारण चञ्चल
दृष्टि वाली, (ग) कटिके विशाल पुरोभागवाली, स्त्रियाँ२ (अपने) प्रियतमको
प्रमोदसे युक्त करनेमें समर्थ होती हैं ॥ ३० ॥
किसे तुम्हारे रूपको देखकर मस्त होने वाले लोगोंमें लिखे जानेके अयोग्य
कर रही हो ? अर्थात् किस एकको अपना कर उसे उन्मदिष्णुओमें अलेख्य
बना रही हो ?
इस व्याख्यामें 'अलेख्यम्'में श्लेष है : (क) लेखा देवाः । तेभ्यो हितो
लेख्यो विष्णुः । न लेख्यः अलेख्यः लेख्याद् भिन्नः । (ख) लेखितुं योग्यो
गणनायोग्य इति यावत् । न लेख्यः अलेख्यः, गणनाया अयोग्यः । अलेः
समकेशम्—समाः तुल्याः केशा यस्य, तत् समकेशम् (बहुव्रीहि) । यहाँ 'अलि'
का सम्बन्ध समुदाय 'समकेश'से सीधे न होकर समुदायके अवयव 'सम'के
द्वारा होनेके कारण३ 'अलि' शब्दमें 'सम'के योगमें षष्ठी हुई है४ ॥ २६ ॥
२६. (२. घ. २.) व्यपेत, सुकर, अर्धसम, चतुष्पादादि यमक—आचार्य
दण्डीने ३० वें श्लोकमें स्त्रियोंके आहार्य और स्वाभाविक सौन्दर्यका वर्णन
किया है । आचार्यका क्रम अर्थपूर्ण है : (क) पहले स्त्रियोंकी समृद्धि बताते
हुए उनके बेशकीमती रत्नों वाले गहनोंसे आहार्य सौन्दर्यको बताया है; फिर
(ख) यौवनमदमाती चञ्चल अँखियोंका वर्णन किया है; आहार्य रूपके बाद
स्वाभाविक रूपके लिये चेहरेपर नज़र पड़ना स्वाभाविक है; (ग) फिर
रमणोंके लिये आकर्षणके केन्द्र कटितटका वर्णन किया है; वहाँ तक पहुँचनेके
१. अन्वय :—(क) उदारमणिभूषणाः, (ख) मद-भ्रमद्-दृशः, (ग)
अदभ्रजघनाः रमणं मुदा अन्वितं कर्तुं क्षमाः ।
२. जघनं स्यात् स्त्रियाः श्रोणिपुरोभागे, कटावपि । मेदिनीकोष
पश्चान्नितम्बः स्त्रीकट्याः, क्लीबे तु जघनं पुरः ॥ अमरकोष २।६।७४
३. महाभाष्य २।१।१ : समासेऽप्युपसर्जनविशेषणं भवति । तद् यथा—
देवदत्तस्य गुरुकुलम्; देवदत्तस्य गुरुपुत्रः; देवदत्तस्य दासभार्येति । वाक्य-
पदीय ३।१४।४८ तथा इसपर हेलाराजकी टीका भी देखें :
समुदायेन सम्बन्धो येषां गुरुकुलादिना ।
संस्पृश्यावयवांस्ते च युज्यन्ते तद्वता सह ॥
४. अष्टाध्यायी २।३।७२ : तुल्यार्थैरतुलोपमाभ्यां तृतीयाऽन्यतरस्याम् ।