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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 270 में से

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पृष्ठ 43

२० काव्यादर्श [ ३।५
(क २.) मेघनादेन हंसानां मदनो मदनोदिना ।
२. मदन (कामदेव) रति (शृङ्गारका स्थायी भाव, प्रेम तथा कामदेव
प्रथम पादमें निरन्तर 'मानेन' वर्णसमुदायकी आवृत्ति की गई है । प्रथम
'मानेन' पद 'मान'का तृतीया एकवचनान्त रूप है, तो दूसरा 'मा + अनेन'का
दीर्घसन्धिसे निष्पन्न वर्णसमुदाय है । पारिभाषिक शब्दत्व अथवा पदत्व
दण्डीको अपेक्षित नहीं है । 'वर्णसमुदाय' अपेक्षित है । अतः यहाँ अर्थविचार
की तनिक भी आवश्यकता नहीं है, और इस प्रकार यह पूर्णतया शब्दालङ्कार
है । क्रियापद 'भूत्' में निषेधार्थक 'मा' (माङ्) के योगमें √भू से लुङ्का
विधान तथा भूतकरण अट्का निषेध है ।¹
यहाँ विप्रलम्भरतिका निरूपण खण्डिता नायिकाके प्रति सखियोंकी
उक्तिके माध्यमसे किया गया है ।
अन्य किसी स्त्रीके प्रति आसक्त नायककी प्रतीक्षा करती नायिका खण्डिता
होती है ।² वह अपने नायकके प्रति यदि मान करती है,³ तो नायकके
निर्लज्ज⁴ होनेकी आशङ्का रहती है । सखियोंने इस लिये खण्डिता नायिका
को गृहागत प्रियके प्रति मान न करके उसे अपनाकर लज्जित करनेकी राय
दी है, ताकि वह अपनी करनीपर लज्जा अनुभव करके भविष्यमें नायिकाके
प्रति ऐसा अपराध न करे ।
यहाँ आचार्यने विप्रलम्भ शृङ्गारमें भी यमकका प्रयोग सरल स्वाभाविक
रूपसे किया है । अतः यह रसविरोधी कथमपि नहीं है । आनन्दवर्धनका
(ध्वन्यालोक २।१५में) विप्रलम्भमें यमकनिबन्धनका सर्वथा निषेध इस प्रकार
के उदाहरणको देखते हुए अतिवाद ही है ।। ४ ।।
२.(१. क. २) द्वितीयपादादि अव्यपेत एकपाद सुकर यमक — इस श्लोकमें
विप्रलम्भ अवस्थामें मानवती कामिनियोंके मनमें उद्दीपन विभाव मेघगर्जनाके
१. अष्टाध्यायी ३।३।१७५ : माङि लुङ् । ६।४।७४ : न माङ्योगे ।
२. व्यासङ्गादुचिते यस्या वासके नागतः प्रियः ।
तदनागमनार्ता तु खण्डितेत्यभिधीयते ।। नाट्यशास्त्र २२।२०६
३. स मानो नायिका यस्मिन्नीर्ष्याया नायकं प्रति ।
धत्ते विकारमन्यस्त्रीसङ्गदोषवशाद् यथा ।। शृङ्गारतिलक २।४४
४. वार्यमाणो दृढतरं यो नारीमुपसर्पति ।
संच्छिन्नः सापराधश्च, स 'निर्लज्ज' इति स्मृतः ।। नाट्यशास्त्र २२।३०६