काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१४] १. १ अव्यपेत पादादि क. एकपाद यमक १६
( १. १ अव्यपेत पादादि क. एकपाद यमक )
१. मानेन मानेन सखि, प्रणयो भूत् प्रिये जने ।
खण्डिता कण्ठमाश्लिष्य तमेव कुरु सत्रपम् ॥ ४ ॥
१. हे सखि, प्रिय जनके प्रति इस मानसे परिचय न हो जाये । खण्डित
(उपेक्षित) तू गले लगाकर उसे ही लज्जित कर ।। ४ ।।
बोध्य नहीं रहता । (ग) पदोंकी सन्धियोंके कारण सुखश्रव्यता भी नहीं रह
पाती । (घ) माथा मारकर यमकको समझ लेनेके बाद भी सहृदयको ऊपरी
धरातलके आवृत्तश्रवणलभ्य आरम्भिक चारुत्वके अतिरिक्त कुछ पल्ले नहीं
पड़ता । यह तो बिना गिरी (गोले) या जलका नारियल है । इस लिये मम्मटने
इसका महत्त्व 'सौ सुनारकी, एक लुहारकी' मुहावरेके अनुसार 'काव्यमें कूबड़'
कहकर ठीक ही स्पष्ट किया है ।
इस प्रकार यमकके महत्त्वकथनकी यात्रा दण्डीके 'वह अनुप्रासके विपरीत
एकान्तः मधुर नहीं है' कथनसे प्रारम्भ होकर आनन्दवर्धनके युक्तियुक्त विस्तृत
विवेचनपर समाप्त हो जाती है । बादमें तो उन्हींकी बातोंको दोहराया गया
है ।। ३ ।।
आषाढशुक्लषष्ठ्यां हि मृगाङ्के सिंहगे गुरौ ।
यूलिद्वितीयघस्रे च यमकैतिह्यमीक्षितम् ।। १ ।।
सुकरं दुष्करं वृत्तं साधयन्ती शिवा मम ।
सदसन्मार्गयोर्भूयात् कल्याणाभिनिवेशनी ।। २ ।।
चन्द्रिकागौरवर्ण्यं चन्द्रिकागौरवर्णिकाम् ।
वृत्तिं कीर्त्ति च मे शश्वद् देयात् कुर्याच्च शाश्वती ।। ३ ।।
—०—
अर्थाभापोऽमला यस्य दिव्या हरन्ति धीमलम् ।
शास्त्रालवणवाराशेरूर्म्मिषूत्तारिणीं तरीम् ।। १ ।।
यमकोदाहृतिव्याख्यां प्रकुर्वे साम्प्रतं सुगाम् ।
अध्येतॄणां सदा तोषमावहेच्छास्त्रगाहिनाम् ।। २ ।।
१. यमकके उदाहरण—आचार्य दण्डीने अगले पन्द्रह (४-१८) श्लोकोंमें
(क) अव्यपेत सुकर आदियमकके सब १५ भेदोंके उदाहरण दिये हैं ।
१. (१. क. १.) प्रथमपादादि अव्यपेत एकपादयमक—चतुर्थ श्लोकके