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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 248, कुल 270 में से

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पृष्ठ 248

३१=५] दोषोंका इतिहास २२५
आचार्य रुद्रटने वामनकी व्यवस्थामें थोड़ा परिष्कार किया : उन्होंने दोषों
को (१) शब्दगत और (२) अर्थगत दो प्रकारका बताकर पदमें अथवा
वाक्यमें स्थित (i) पदगत, (ii) वाक्यगत एवम् (iii) अर्थगतके रूपमें
व्यवस्थित किया । १ आचार्य भोजने तो रुद्रटके वर्गीकरणको आधार बनाया ही
है, मम्मटने भी रुद्रटके वर्गोंमें आनन्दवर्धनोक्त रसविरोधको एक वर्गके रूपमें
जोड़कर व्यवस्थाको पूर्णतया विकासकी स्थितिमें प्रस्तुत किया है ।
रुद्रटने कुछ नवीन दोषोंकी उद्भावना भी की है । उनमें सर्वाधिक महत्त्व-
पूर्ण दोष है विरस नामक अर्थदोष : अन्य रसके प्रसङ्गमें क्रमके विपरीत जो
कोई दूसरा रस आ जाए, तब विरस नामक दोष होता है । २ इस दोषका
महत्त्व इस बातसे और बढ़ जाता है कि काव्यमें रसके महत्त्वको अपने-अपने
ढंगसे स्वीकार करते हुए भी दण्डी, भामह और वामन रसके महत्त्वके बारेमें
उतने स्पष्ट और मुखर नहीं हैं, जितने कि रुद्रट हैं । काव्यको रसयुक्त बनाने
को अत्यधिक (महीयस्) यत्नका उनका उपदेश ३ और शान्तसमेत नौ रसोंका
उनका निरूपण उन्हें रसको ‘रसवत्’ नामक अलङ्कार मानने वाले आचार्योंकी
अपेक्षा रसको अत्यन्त महत्त्व देनेवाले आचार्य आनन्दवर्धनके कहीं अधिक
निकट सिद्ध करता है । आगेका इतिहास भी यही कहता है । रीतियोंका
रसोंसे सम्बन्ध भी रुद्रटने ही सर्वप्रथम जोड़ा है । ४ इस प्रकार गुणों और
१. असमर्थमप्रतीतं विसन्धि विपरीतकल्पनं ग्राम्यम् ।
अव्युत्पत्ति च देश्यं पदमिति सम्यग् भवेद् दुष्टम् ।। काव्यालं० ६।२
तत्र पदं वाक्यं वा पुनरुक्तं नैव दोषाय ।। ३४
यस्मिन्तनेकमर्थं स्वयमेवालोचयेत् तदर्थानि ।
जल्पन् पदानि तेषामसङ्गतिर्नैव दोषाय ।। ३८
वाक्यं भवति तु दुष्टं सङ्कीर्णं गर्भितं गतार्थं च । ४०
अपहेतुरप्रतीतो निरागमो बाध्यन्नसम्बद्धः ।
ग्राम्यो विरसस्तद्वानतिमात्रश्चेति दुष्टोऽर्थः ।। ११।२
२. अन्यस्य यः प्रसङ्गे रसस्य निपतेद् रसः क्रमापेतः ।
विरसोऽसौ; स च शक्यः सम्यग् ज्ञातुं प्रबन्धेष्यः ।। काव्या० ११।१२
३. ननु काव्येन क्रियते सरसानामवगमश्चतुर्वर्गे ।
लघु मृदु च; नीरसेभ्यस्ते हि त्रस्यन्ति शास्त्रेभ्यः ।। काव्या० १२।१
तस्मात् तत् कर्तव्यं यत्नेन महीयसा रसैर्युक्तम् ।
४. इह वैदर्भी रीतिः पाञ्चाली वा विचार्य रचनीया ।
मधुरललिते कविना कार्ये वृत्तौ तु शृङ्गारे ।। काव्यालं० १४।३७