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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 247

२२२ काव्यादर्श [३।१८५
तथा उसके अनुसार स्थापित लोकमर्यादाके विपरीत था । किन्तु द्रौपदीके
भाग्यमें विधाताने लेख ही ऐसा लिखा था, जिसके अनुसार उसे इस प्रकारकी
धर्मविरुद्ध स्थितिका निश्छल भावसे पालन करना था । अपने इसी कर्तव्यबोध
तथा उसके पालनके कारण वह 'परम सती' कहलाई । इस प्रकार कविने
चतुर्थ पादसे आगमविरोध दोषका परिहार कर दिया । महाभारतके लेखकने
भी इसी लिये द्रौपदीके चरित्रके निरूपणमें शङ्करसे पाँच बार पति देनेकी
प्रार्थना करने वाली ऋषिकन्याको शङ्कर द्वारा पाँच पति पानेके वरकी
कल्पना की है ।
इस प्रकार आचार्यने (१०) देशादिविरोध दोषके छहों भेदोंमें कवि-
कौशलसे दोषत्वका परिहार करके गुणत्वका उदाहरणोंसे निदर्शन किया ।
अन्य दोषोंके दोषत्वके परिहारकी दिशाका निर्देश आचार्य तत्तद् दोषके
प्रसङ्गमें कर चुके हैं ।
दोषधुन्धुत्तरी प्राप्ता नगोच्चं भरतं शुभा ।
काव्यदोषनिराकृत्या सोपयोगा पयस्विनी ॥ १ ॥
दण्डिदेवप्रयागेऽथ रम्या हृद्या सुधीहिता ।
भामहोपत्यकाग्रामवगाहधौतधीमला ॥ २ ॥
दोषस्रोतस्विनी सेयं व्याख्याता मूलशोधनात् ।
भाद्राजैकादशीसौम्ये प्रातश्चन्द्रे रहो गते ॥ ३ ॥
— ० —
शुभे विंशे दिनेऽगस्त्यमासस्याद्य गुरौ पुनः ।
दोषशैवलिनी रम्या वामनग्रामतो गता ॥ १ ॥
विशेषान् यानथ प्राप्ता रुद्रटतीर्थसङ्गता ।
व्याख्यास्ये तानहं सम्यक् सर्वस्यानन्दवर्धनान् ॥ २ ॥
प्रीयतामथ पुण्येयं सर्वभूतिप्रदा शिवा ।
इदम्परमवद्धेजा धीप्रदा शारदा मयि ॥ ३ ॥
दोषोंका इतिहास—आचार्य दण्डीने इन सर्वमार्गसाधारण दस दोषोंके
अतिरिक्त मार्गविशेषके कुछ अन्य दोषोंकी चर्चा भी काव्यादर्शमें यत्र तत्र की
है । उनमें से बन्धके १ शैथिल्य, २ वैषम्य और ३ पारुष्य नामक तीन
दोष, ४ दुष्प्रतीति, ५ शब्दगत और ६ अर्थगत ग्राम्यता दोष, ७ नेयार्थता,
८ आकुलता और ६ लोकसीमातिक्रमण दोषोंका उल्लेख प्रथम परिच्छेदके
गुणप्रकरणमें (पृष्ठ ६८में) किया जा चुका है । दण्डीने इनमें से कुछका