काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।१५२] ५ दोष : (७) यतिभ्रष्ट—यतिक स्वरूप १८१
तदपेतं यतिभ्रष्टं श्रवणोद्वे जनं, यथा ॥ १५२ ॥
उससे रहित, कानोंका उद्वेजक यतिभ्रष्ट दोष होता है। जैसे—॥ १५२ ॥
स्वरूप बताया है। आचार्य पिङ्गलने विच्छेदको यति बताया है।¹ श्लोक
और तदन्तर्गत पदोंमें विच्छेद, उच्चारणविराम उच्चारणमें सुविधा और
लयमें श्रुतिसुख लानेको किया जाता है। भरतने यति अर्थात् विराम के दो
प्रकार बताये हैं : (१) छन्दःशास्त्रके नियमोंके अधीन किया जाने वाला
(वृत्तपादसमुद्भव) विराम उच्चारण करने वालेके प्राणबलके अनुकूल² उच्चा-
रणसुविधाके लिये होता है । अतः उन्होंने इसे 'प्राणवश विराम' कहा है ।
(२) अभिनयमें रस भावकी सम्यग् अभिव्यक्ति के लिये अर्थके किसी उचित
अंशपर विराम 'अर्थवश विराम' होता है । उनकी दृष्टिमें अभिनयकी
मुख्यताके कारण प्राणवशा यतिकी अपेक्षा अर्थवशा यति महत्त्वपूर्ण है । पद्यमय
काव्यमें उसका महत्त्व नहीं होता । अतः छन्दःशास्त्रमें प्राणवशा यतिका ही
विधान किया जाता है। भरतने विरामकी अवधि एक मात्रासे लेकर छह
मात्रा तक बताई है।³
१. छन्दःशास्त्रे ६।१ : यतिर्विच्छेदः । नाट्यशास्त्रमें विराम (१७।१३०
गद्यके बाद) भी देखें ।
२. इदमत्रावगन्तव्यमवधानविवर्जितः ।
यावन्ति शक्नुयाद्वक्तुमप्राणन्नेव मानवः ।। वेङ्कट, ऋग्भा ६।८।१।२१
तावद्भिरक्षरैरर्थः प्रायेण प्रतिपाद्यते । २२
३. ये विरामाः स्मृता वृत्ते तेष्वलङ्कार* इष्यते ।
समाप्तेऽर्थे पदे वाऽपि, तथा प्राणवशेन वा ।। नाटच० १७।१३८
कार्यों विरामः पादान्ते, तथा प्राणवशेन वा ।
शेषमर्थवशेनैव विरामं संप्रयोजयेत् ।। १३६
कलाकालप्रमाणेण पाठ्यं कार्यं प्रयोक्तृभिः ।। १४१
शेषाणामर्थयोगेन विरामे विरमेदिह ।
एकद्वित्रिचतुष्पञ्चषट्कलं च विलम्बितम् ।। १४२
अथवा कारणोपेतं प्रयोगं कार्यमेव च ।
समीक्ष्य वृत्ते कर्तव्यो विरामो रसभावतः ।। १४४
ये विरामाः स्मृताः पाठ्ये वृत्तपादसमुद्भवाः ।
उत्क्रम्यापि क्रमं तज्ज्ञैः कार्यास्ते स्यू रसानुगाः ।। १४५
*उच्चो दीप्तश्च मन्द्रश्च नीचो द्रुतविलम्बितौ ।
पाठ्यस्यैते ह्यलङ्कारा लक्षणं च निबोधत ।। ११२