काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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(७) श्लोकेषु नियतस्थानं पदच्छेदं यतिं विदुः ।
(७) श्लोकोंमें निश्चित स्थानोंमें पदोंके तोड़नेको यति जानते हैं ।
(पाणिनि आदि), पदकार (पदविच्छेदादिसे सूत्रपाठके व्याख्याता)¹ को इष्ट
प्रयोगसे जो भिन्न (विपरीत) होवे, उसे 'शब्दहीन' कहते हैं ।² क्योंकि आप्त
श्रोताओंमें उस लक्षणविरुद्ध शब्दकी सिद्धि नहीं है । भामहने इस अन्तिम
कथनसे इस दोषके विषयमें आप्त पुरुषोंको भी प्रकारान्तरसे प्रमाणकोटिमें
रख लिया है । पर दण्डीके समान निर्भ्रान्त स्पष्ट रूपसे लक्षणविरुद्ध किन्तु
आप्तश्रावकसिद्ध (दण्डीके 'शिष्टेष्ट') प्रयोगको निर्दोष नहीं बताया है । इस
अंशमें भी दण्डी भामहसे बाजी मार ले गये हैं । अभिनवगुप्तने 'अपशब्द'
(शब्दहीन)को दोष ही माना है । पर उनके तर्कसे प्रतीत होता है कि उन्हें
'अपशब्द'से शिष्टों द्वारा अननुमत शास्त्रविरुद्ध प्रयोग अभीष्ट है । उनका
कहना है कि अपशब्दसे किसी प्रकारकी अर्थप्रतीति नहीं होती । वह सङ्केत-
ग्रहण न होनेसे किसी भी प्रकार भावसम्प्रेषण नहीं कर पाता । अतः अपशब्द
दोष ही है ।³ अभिनवगुप्तका यह कथन दण्डीके कथन जितना युक्तियुक्त नहीं
है । दण्डी द्वारा प्रस्तुत लक्षणविरुद्ध किन्तु शिष्टेष्ट उदाहरणमें अर्थप्रतीति-
विरह नहीं है । वह भामहकी शब्दावलीमें 'आप्तश्रावकासिद्ध' भी नहीं है ।
अतः उसे दोष कैसे कह सकते हैं ? ।। १५१ ।।
(७) यतिभ्रष्ट दोष—'यतिभ्रष्ट' दोष बतानेसे पूर्व आचार्यने यतिका
१. पं० युधिष्ठिर मीमांसकने 'पदकार'से महाभाष्यकार पतञ्जलिको लिया
है । द्र० संस्कृत व्याकरण शास्त्रका इतिहास, भाग १, पृष्ठ ३३२ । परन्तु
महाभाष्य ३।१।१०६, ६।१।२०७ तथा ८।२।१६ में उल्लिखित 'पदकार'
के प्रयोगसे विदित होता है कि सूत्रके संहितापाठका पदविच्छेद करने
वाले व्याख्यातामात्र 'पदकार'के रूपमें अभीष्ट हैं, व्यक्तिविशेष नहीं ।
इन स्थलोंपर प्रदीप देखें । अतः यहाँ सूत्रके व्याख्याता वार्तिक-भाष्य-
कार इष्ट हो सकते हैं ।
२. सूत्रकृतपदकारेष्टप्रयोगाद् योऽन्यथा भवेत् ।
तमाप्त-श्रावकासिद्धेः शब्दहीनं विदुर्यथा ॥ काव्याल० ४।२२
‘स्फुरत्तडिद्वलयिनो वित्ताम्भोगरीयसः ।
तेजस्तिरयतः सौरं घनान् पश्य दिवोऽभितः’ ।। २३
३. अभिनवभारती १६।६४ : अपशब्दस्तु दोष एव । ततः कस्याश्चिदर्थ-
प्रतीतेरभावात् । स हि न कांचिद् भाषामनुपतति, सङ्केताभावान्न तमर्थं
प्रतिपादयेत् ।