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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 185, कुल 270 में से

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पृष्ठ 185

१६२ काव्यादर्श [३।१३४
किसी भले आदमीको कोई परस्त्री भा गई । उसके मनमें अपनी इस
स्थितिको लेकर अन्तर्द्वन्द्व है : उसे अपनी सच्चरित्रताका भी भान है । ऐसी
स्थितिमें उसे पराई नारीकी ओर आँख उठाकर भी नहीं देखना चाहिये,
चाहतकी तो बात ही दूर है । पर मनमें उसके प्रति आसक्तिका काँटा जो
चुभ रहा है, वह उसे उसके सङ्गसुखके लिये व्याकुल कर रहा है । इस अन्त-
र्द्वन्द्वको प्रकाशित करने वाला यह विरोधी कथन कथमपि दोष नहीं कहला
सकता । 'व्यर्थ' कथन हर हालतमें दोष नहीं है, अपितु चित्तवृत्तिके विरोधी
स्थितिमें अवस्थिति होनेपर, यह गुण हो जाता है ।
इस भावकी आंशिक प्रेरणा दण्डीको शाकुन्तलम्में शकुन्तलाको देखकर
उसपर आसक्त दुष्यन्तकी अन्यथा वर्णित मनोदशासे मिली प्रतीत होती है ।¹
यों, लोचन (२।३) में भावशबलताके लिये उद्धृत एक श्लोकमें भी इस
प्रकार का प्रबन्धगत वाक्यविरोध है ।²
लोचनोद्धृत श्लोकके स्थलके बारेमें विद्वानोंमें मतभेद है : (क)
कुछ लोग इसे उर्वशीको देखकर मोहित पुरूरवाकी उक्ति मानते हैं, तो (ख)
अन्य लोग शुक्रकन्या देवयानीको देखकर उसपर आसक्त राजा ययातिकी
उक्ति मानते हैं । विक्रमोर्वशीयमें यह श्लोक उपलब्ध नहीं है । १८७६ की
विक्रमोर्वशीयकी पाण्डुलिपिमें इसे १२२वें पृष्ठपर चौथे अङ्कमें अधिक पाठके
रूपमें जोड़ा हुआ है ।³ लोचनके अतिरिक्त⁴ यह श्लोक सरस्वतीकण्ठाभरण
(१।१७७) और काव्यप्रकाश (४।५३) में उद्धृत है । स्थलसङ्केत कहीं नहीं
है । उपर्युक्त दो मत काव्यप्रकाशके टीकाकारोंके हैं ।⁵ यदि यह श्लोक
विक्रमोर्वशीयका है, तो इसका स्थल द्वितीय अङ्कमें है, जहाँ राजा देवराजके
पास गई हुई उर्वशीको याद करके बेचैन है । दिव्य (इन्द्रकी अप्सरा) उर्वशी
पार्थिव पुरुरवाके लिये परदारा है । जयन्त और महेश्वरके मतमें चौथे अङ्कमें
१. (असंशयं क्षत्रपरिग्रहक्षमा) यदार्यमस्यामभिलाषि मे मनः । शा० १।२०
२. क्वाकार्यम्, शशलक्ष्मणः क्व च कुलं ?' भूयोऽपि दृश्येत सा;
दोषाणां प्रशमाय नः श्रुतम्; अहो कोपेऽपि कान्तं मुखम् ।
किं वक्ष्यन्त्यपकल्मषाः कृतधियः ? स्वप्नेऽपि सा दुर्लभा;
चेतः, स्वास्थ्यमुपेहि; कः खलु युवा धन्योऽधरं धास्यति ? ॥
३,५. काव्यप्रकाश ४।५३ पर झळकीकरटीका देखें ।
४. अभिनवगुप्तने अभिनवभारती (१६।१३५) में भोजका उल्लेख किया है ।
अतः 'लोचनके पश्चात् ' नहीं कहा है ।