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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 184, कुल 270 में से

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पृष्ठ 184

३।१३२-१३४] ५. दोष : (२) व्यर्थ १६१
(क) जहि शत्रुकुलं कृत्स्नं, जय विश्वम्भरामिमाम् ।
(ख) न हि ते कोऽपि विद्वेष्टा सर्वभूतानुकम्पिनः ॥ १३२ ॥
अस्ति काचिदवस्था सा साभिषङ्गस्य चेतसः ।
यस्यां भवेदभिमता विरुद्धाथार्याऽपि भारती ॥ १३३ ॥
(क) परदाराभिलाषो मे कथमार्यस्य युज्यते ! ।
(ख) पिबामि तरलं तस्याः कदा नु दशनच्छदम् ! ॥ १३४ ॥
(क) नष्ट कर समूचे शत्रुसमूहको । जीत इस विश्व (सब) का धारण
पोषण करने वाली (पृथ्वौ) को । (ख) नहीं है सब (जड-चेतन) पदार्थोंपर
तुम कृपालु का कोई शत्रु ॥ १३२ ॥
(राग-द्वेषादि भावोंसे) पराभूत मनकी वह कोई अवस्था होती है, जिसमें
विरुद्ध अर्थ वाली वाणी भी अभीष्ट हो सकती है ॥ १३३ ॥
(क) मुझ आर्य (सच्चरित) की परस्त्रियोंके प्रति इच्छा कैसे उचित
होगी ? (ख) उस (प्रिय परस्त्री) के चञ्चल अधरका पान कब कर
पाऊँगा ? ॥ १३४ ॥
'व्यर्थ'का दण्डीका उदाहरण—१३२वें श्लोकमें मुक्तक प्रबन्धमें तीन
वाक्य हैं । प्रथम दो वाक्योंवाले पूर्वार्धमें जो बात कही गई है, उसका विरोधी
कथन उत्तरार्धमें दिये वाक्यमें दिया है : (क) पूर्वार्धमें समस्त शत्रुओंको
नष्ट करनेका और सर्वभूतधात्री पृथ्वोको जीतनेका विधान किया है । (ख)
उत्तरार्धमें इसका पहला विरोधी कथन तो यह है कि शत्रुसमूहका नाश करने
को विहित पुरुषका कोई शत्रु ही नहीं है । तब क्या वह हवामें तलवार
भाँजेगा ? दूसरा विरोध यह है कि जब वह सब भूतोंके प्रति दयालु है, तो
हिंसा कैसे करेगा ? इस प्रकार यहाँ चतुर कविने एक ही उदाहरणमें (क)
वाक्योंमें विरोधका प्रदर्शन भी कर दिया : प्रथम वाक्यके 'जहि' क्रिया पद
का विरोध चतुर्थपादके सर्वभूतानुकम्पिनः पदसे और 'शत्रुकुलं कृत्स्नं' कार-
कांशका विरोध तृतीय पादके पदोंसे; और (ख) मुक्तक प्रबन्धमें आन्त-
रिक विरोधका भी प्रदर्शन कर दिया है ॥ १३२ ॥
'व्यर्थ' अनित्य दोष है : जिस प्रकार बुद्धिकी विशेष अवस्था हेतुज या
सहेतुक अस्वस्थतामें (१) अपार्थ दोष नहीं होता, वैसे ही बुद्धिकी रागादिसे
परिभूतताकी स्थितिमें 'व्यर्थ' भी दोष नहीं होता । अतः यह अनित्य दोष
है । यह विचार भी भरत और भामहने नहीं किया है ॥ १३३ ॥
'व्यर्थ' की निर्दोषताका उदाहरण : १३४वें श्लोकमें कविने मनके
रागावेशकी स्थितिमें वाक्यगत व्यर्थ की निर्दोषताका उदाहरण दिया है।