काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५८ काव्यादर्श [३।१२८
'पूए ।' यहाँ अनार और पूए सञ्ज्ञापद अपने-अपने निकटवर्ती विशेषण सङ्ख्या
पदोंसे अन्वित होकर तत्तत्पदार्थगत अर्थको प्रतीत कराते हुए भी दोनों सञ्ज्ञा-
पदोंके समुदायकी सङ्गतिरूप अर्थ नहीं प्रतीत करा पाते । इसलिये ये दोनों
संज्ञा पद और उनके माध्यमसे विशेषणीभूत सङ्ख्या पद किसी सामूहिक
(अन्वित) अर्थकी प्रतीति नहीं करा पा रहे हैं । यह प्रयोग उपलक्षण है पदों
और वाक्योंकी अन्वितार्थताके अभावमें निष्पन्न अपार्थताका ।
आचार्य रत्नश्रीज्ञानने इस प्रसङ्गमें कहा है कि प्रकरणको देखते हुए पदों
के समुदायके सम्बन्धसे निष्पन्न वाक्यरूप समुदायका अर्थ गौण-प्रधानभावसे
स्थित क्रिया और कारकोंके विशेष (समुदाय) सम्बन्धके रूपमें व्यवहारमें
आता है; उससे रहित 'समुदायार्थशून्य' होता है । केवल पदोंके अर्थके रूपमें
नहीं। क्योंकि वह तो कहीं भी व्यभिचरित नहीं होता । 'दस अनार, छह
'पूए' इत्यादिमें भी पदोंके अर्थकी प्रतीति तो होती ही है ।२
इसी तर्कको आगे बढ़ाकर यह कहा जा सकता है कि जिस प्रकार पद-
समुदाय रूप वाक्यमें पदोंके द्वारा समुदायार्थकी प्रतीति न करानेपर अपार्थता
हो जाती है, वैसे ही वाक्यसमुदायरूप महावाक्य तथा तत्समुदायरूप प्रबन्धमें
भी अवयवोंके द्वारा समुदायार्थकी प्रतीति न करानेपर अपार्थता दोष होगा ।
भरतका पाद और भामहके पद एवं वाक्य इसी विशाल अर्थके उपलक्षक हैं ।
दण्डीके अनुसार अपार्थ अनित्य दोष है : इस प्रकारके अपेतार्थ प्रयोग
सर्वदा दोष होते हों, ऐसा नहीं है । बुद्धिके हेतुज या अहेतुक विकासके अभाव
में इस प्रकारके कथन स्वाभाविक हैं । (१) मद्यादि पानके कारण बुद्धिकी
१. अपार्थमित्यपेतार्थं, स चार्थः पद-वाक्ययोः । काव्याल० ४।३
समुदायार्थशून्यं यत्, तदपार्थकमितीष्यते ।
'दाडिमानि दशापूपाः षड्' *इत्यादि यथोदितम् ॥ ८
*तुलनीय महाभाष्य १।२।४५ वा० १ : 'दश दाडिमानि षडपूपाः
॰॰॰स्फैयकृतस्य पिता प्रतिशीनः' इति । समुदायोऽत्रानर्थकः ।
शाबरभाष्य १।१।५, आनन्दाश्रम, पृष्ठ ४७ : लौकिकानि वचनान्युप-
पन्नार्थान्यनुपपन्नार्थानि च दृश्यन्ते । यथा 'देवदत्त गामभ्याज' इत्येव-
मादीनि, 'दश दाडिमानि, षडपूपा' इत्येवमादीनि च ।
२. रत्नश्री : समुदायस्य, प्रकरणात् पदसम्बन्धिनो वाक्यस्यार्थोऽभिधेयम-
ङ्गाङ्गिभूतक्रियाकारक सम्बन्धविशेषलक्षणं सांव्यवहारिकम् । तेन शून्यं
रहितम् । न पदार्थमात्रेण, तस्य क्वचिदप्यव्यभिचारात् । दश दाडिमानि,
षडपूपा' (भामह ४।८) इत्यादावपि पदार्थप्रत्ययोदयात् ।