काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
पृष्ठ 180, कुल 270 में से
संदर्भ में पढ़ें३।१२८ ] ५ दोष : लक्षणोदाहरण १५७
(१) समुदायार्थशून्यं यत् तदपार्थमितीष्यते ।
तन्मत्तोन्मत्तबालानामुक्तेरन्यत्र दुष्यति ॥ १२८ ॥
(१) जो सामूहिक अर्थसे शून्य होता है, वह अपार्थ इस नामसे इष्ट है ।
वह नशेमें मदहोश, उन्मादरोगग्रस्त (पागल) और बच्चोंकी उक्तिसे अन्य
उक्तियोंमें दोष होता है ॥ १२८ ॥
अवश्य किया है । किन्तु एकार्थ दोषके दण्डीने (१) अर्थतः और (२) शब्दतः
दो भेद बताये हैं । भामहने शब्दजन्य एकार्थका खण्डन किया है । इससे सिद्ध
होता है कि यहाँ भी भामह ही दण्डीके विपरीत प्रतिज्ञाहानि दोषका
औचित्य सिद्ध कर रहे हैं । यदि इसका उलट होता, तो दण्डीने भामहके मतके
विपरीत शब्दजन्य एकार्थताकी स्थापनामें कोई युक्ति दी होती ! ॥ १२७ ॥
(१) अपार्थ—'अपार्थ'का शाब्दिक अर्थ होता है अर्थादपेतः । जिस
प्रकार पदसमुदायकी परस्पर सङ्गतिसे वाक्यार्थ निष्पन्न होता है, वैसे ही
वाक्योंके समुदायमें सङ्गति होनेसे महावाक्यार्थ (प्रकरणार्थ) निष्पन्न होता
है । प्रकरणार्थ रूप महावाक्यार्थोकी सामूहिक एकवाक्यतासे प्रबन्धार्थकी
निष्पत्ति होती है । इनमें से किसी भी स्थितिमें समुदायार्थ यदि निष्पन्न नहीं
होता है, तो वह पद, वाक्य या प्रबन्धप्रयोग विवक्षित अर्थसे रहित होनेसे
'अपेतार्थ' कहलाता है ।
भरतने इसे 'अभिप्लुतार्थ' नामसे दिया है । उन्होंने काव्यका सबसे छोटा
अवयव होनेके कारण पादके समुदायार्थशून्यत्वको 'अभिप्लुतार्थ' दोष नाम
दिया है : जो पादसे समेट दिया जाता है, जिसका पादके बाद सम्बन्ध नहीं
रहता, उसे 'अभिप्लुतार्थ' जानना चाहिये ।१ इसका शाब्दिक अर्थ होगा :
अभिप्लुतः अभिद्रुतः अपेतः अर्थः समुदायार्थरूपो यस्मात् ।
दण्डीने भरतका अनुकरण करते हुए पादकी समुदायार्थशून्यताका
उदाहरण दिया है । उन्होंने पदोंकी समुदायार्थ-शून्यताका निरूपण न लक्षणमें
किया है, और न उदाहरण ही इस दृष्टिसे दिया है ।
भामहने दण्डीकी शब्दावली देते हुए इसे (१) पदगत और (२) वाक्यगत
बनाकर पदोंकी समुदायार्थशून्यताका ही उदाहरण दिया है : अनार दस, छह
१. अभिप्लुतार्थं विज्ञेयं यत् पादेन समस्यते ॥ नाट्य० १६।६२