काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(१४) काव्यादर्श
उतना अच्छा नहीं लगता ३३, ४ द्वितीय-तृतीय-पादादि (२३), ५ द्वितीय-
चतुर्थ-पादादि (२४) ३४, ६ तृतीय-चतुर्थ-पादादि (२५), वराहवर्णनका
ऐतिहासिक सन्दर्भ ३५, डॉ० कृष्णकुमारके मतका खण्डन ३६; ग. त्रि-पाद-
वर्ती (२६-२८) ३६-३८ : प्रथम-द्वितीय-तृतीय-पादादि (२६) ३६, २.
प्रथम-तृतीय-चतुर्थ-पादादि (२७) ३७; ३ द्वितीय-तृतीय-चतुर्थ-पादादि (२८)
३८; घ. चतुष्पादवर्ती (२६-३२) ३६-४२ : १ एकजातीय (२६) ३६,
व्याख्याभेद, २ अर्धसम (३०) ४०, 'अन्वीतम्' की व्याख्या ४१, ३ विषम
(३१), ४ व्यत्यस्त (३२) ४२;
व्यपेत भेदके उदाहरणोंका विश्लेषण (३३) ४३;
३. अव्यपेत-व्यपेत यमक (३३-३६) ४३-४६ : घ. चतुष्पाद १ अर्ध-
सम (३४) ४३, 'साल' पर विचार ४४, २ व्यत्यस्त (३५) ४५, ३ सजा-
तीय (३६) ४६, व्याख्याभेदपर विचार ४७, 'निशा' पर टिप्पणी;
१. आदियमकके उदाहरणों का विश्लेषण (३७-३८) ४७-४८;
(ख) दुष्कर यमक (३६-७७) ४८-६४ : १. अव्यपेत-व्यपेत घ. चतु-
ष्पाद २. मध्यवर्ती सजातीय यमक (३६) ४८, २. (२) व्यपेत घ. चतुष्पाद
२ मध्यवर्ती सजातीय यमक (४०) ४६, ३. व्यपेत सजातीय चतुष्पादान्त
यमक (४१), ४. अव्यपेत-व्यपेतात्मक सजातीय चतुष्पादान्त यमक (४२)
५०, रत्नश्रीज्ञान और तरुणवाचस्पतिसे मतभेद, 'सन्नतेनते' पर टिप्पणी
५१, ५. व्यपेत चतुष्पाद-मध्यान्तगत सजातीय यमक (४३), ६. अव्यपेत
चतुष्पादाद्यन्तगत सजातीय (४४), मतभेदपर विचार ५३, पाठभेदमें यमक-
भेद ५४, ७. व्यपेत चतुष्पाद अर्धसम सजातीय आदि-मध्ययमक (४५), पाठ-
भेदसे यमकभेद तथा व्याख्याभेद ५५, ८. अव्यपेत-व्यपेत चतुष्पादाद्यन्तवर्ती
सजातीय यमक (४६) ५६, व्याख्याभेद ६. अव्यपेत-व्यपेत चतुष्पादाद्यन्तगत
सजातीय यमकका दूसरा प्रकार (४७) ५७, १०. पादाद्यन्त तथा अन्तादि
चतुष्पादअव्यपेत-व्यपेत सजातीय यमक (४८) ५८, ११ व्यपेत चतुष्पादादि
मध्यान्त तथा अव्यपेत चतुष्पादान्तादि सजातीय सङ्कीर्ण यमक (४६) ५६,
प्राचीन टीकाकारोंसे मतभेद ६०, १२ आदि-मध्यान्तवर्ती चतुष्पाद अव्यपेत-
व्यपेत त्रिस्थान यमक (५०) ६१, 'काल-काल'का ऐतिहासिक महत्त्व ६२;
यमकके अन्य विशिष्ट भेद—(१) संदष्ट यमक : (५१) ६३, इतिहास,
उदाहरण (५२) ६५, टीकाओंसे मतभेद ६६;