काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषयानुक्रमणी
समर्पणम्—पृष्ठ (३); मङ्गलम् (४);
भूमिका (५-१२)—मंगलाचरण (५), १. टीकालेखनमें निमित्त,
२. तृतीय परिच्छेदका नाम, ३. विषय-विवेचन—(क) सिंहावलोकन (३),
(ख) तृतीय परिच्छेद (७); (१) यमक, (क) लक्षण, (ख) भेदविकल्पनके
आधार, (२) आकार चित्र बन्ध, (३) वर्ण-नियमवान् चित्रबन्ध (८),
(४) प्रहेलिका, (५) दोष, वर्गीकरण (६), ४. प्रसादिनीके बारेमें कुछ
(१०); ५. आभार (१२), निवेदन ।
'दुष्कर' नामक तृतीय परिच्छेद
(अ) शब्दालङ्कार
१. यमक (श्लोक १-७७) पृष्ठ १-६४—लक्षण (१) १-३; भेद (१-३)·
३-७; अन्य आचार्योंके मतमें ७-१६;
उदाहरण (४-७७) १६-६४—
(क) सुकर १ आदियमक (४-३७) १६-४७ :
१. अव्यपेत (४-१८) १६-३० : क. एकपादवर्ती (४-७) १६-२१ : १
प्रथमपादादि (४) १६, २ द्वितीयपादादि (५) २०, ३ तृतीयपादादि (६)
२१, ४ चतुर्थपादादि (७) २१, ख. द्विपादवर्ती (८-१३) २२-२६ : १
प्रथम-द्वितीयपादादि (८) २२, २ प्रथम-तृतीयपादादि (६) २३, ३ प्रथम-
चतुर्थपादादि (१०) २३, ४ द्वितीय-तृतीयपादादि (११) २४, ५ द्वितीय-
चतुर्थपादादि (१२) २५, ६ तृतीयचतुर्थपादादि (१३) २६; ग. त्रिपादवर्ती
(१४-१७) २६-२६ : १ प्रथमद्वितीयतृतीयपादादि (१४) २६, २ प्रथम-
द्वितीय-चतुर्थपादादि (१५) २७, ३ प्रथमतृतीय-चतुर्थ-पादादि (१६) २८,
४ द्वितीय-तृतीय-चतुर्थ-पादादि (१७) २६; घ. चतुष्पादवर्ती (१८) ३०;
२. व्यपेत (१६-३३) ३०-४३ : ख. द्विपादवर्ती (२०-२५) ३१-३६ :
१ प्रथम-द्वितीय-पादादि (२०) ३१; 'एणदृश्' की व्याख्या, २ प्रथम-तृतीय-
पादादि (२१) ३२, ३ प्रथम-चतुर्थ पादादि (२२), मोरनियोंका वर्णन