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सर्वकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 270 में से

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पृष्ठ 151

१२८ काव्यादर्श [३।१०२
(१०) निभृता निभृतान्यार्था तुल्य-धर्म-स्पृशा गिरा ॥ १०२ ॥
(१०) समान धर्मों (अथवा तुल्य धर्म वाले अर्थों) को स्पर्श करने वाली
वाणी (शब्दों) से अन्य अर्थको छुपाने वाली पहेली निभृता होती है ॥१०२॥
(८) 'प्रकल्पिता' में अर्थान्तरकल्पना श्रोताको हो जाती है, वह कविको
विवक्षित नहीं होती । अर्थात् कवि उन अनेक अर्थोंका वर्णन पहेलीमें नहीं
करता, वह तो श्रोताको आभासित होती है; जब कि 'नामान्तरिता' में नाना
अर्थ कविको विवक्षित होते हैं ।
प्रेमचन्द्र शर्मानि यहाँ 'नाम' से 'वस्तु' (अर्थ) ली है, केवल उसकी बोधक
सञ्ज्ञा नहीं । इससे वर्णित पदार्थमें नाना (भिन्न) अर्थकी कल्पनासे भी
'नामान्तरिता' निष्पन्न हो जाती है ।¹
यह प्रहेलिका भी अर्थगूढा है । ११६वाँ श्लोक इसका उदाहरण है ।
(१०) निभृता—विवक्षित और अविवक्षित पदार्थोंके समान धर्मोंको छूने
वाली पदावलीके प्रयोगसे अन्य अर्थको छुपाकर प्रस्तुत करने वाली उक्ति
छुपानेके कारण 'निभृता' प्रहेलिका कहलाती है । आचार्य रत्नश्रीज्ञानने
'तुल्य-धर्म-स्पृशा गिरा' की दो व्याख्याएँ की हैं: (१) विवक्षित और अवि-
वक्षित दोनोंमें वर्तमान होनेके कारण तुल्य=समान अर्थरूपी धर्मको, उसे
निमित्त बनाकर प्रवृत्तिके कारण छूने वाले, (२) विवक्षित अर्थके समान धर्म
१. रङ्गाचार्यरेड्डी, प्रभा : अत्राहू: प्रेमचन्द्रशर्माण:—लक्षणे 'नाम'-पदं च
'वस्तु'-परं, न तु 'सञ्ज्ञा' मात्रपरं बोध्यम् । तेन
'तरुण्याऽऽलिङ्गितः कण्ठे नितम्बस्थलमाश्रितः ।
गुरूणां सन्निधानेऽपि कः कूजति मुहुर्मुहुः ? ॥'
अत्र 'सजल-कलश'-रूप-वस्तुनि वक्तव्ये प्रथमं नानाऽर्थकल्पनान्
नामान्तरिता । एवं
'य एवादौ स एवान्ते मध्ये भवति मध्यमः ।
अस्यार्थं यो न जानाति, तन्मुखे तं ददाम्यहम् ॥'
इत्यादावपि अत्र 'यवसः' प्रतिपाद्य इति । इस उदाहरणमें 'यः', में
सर्वनामरूप नानार्थकी कल्पना होती है । उसके बाद नाम शब्दमें उसके
घटक वर्णोंके आदि, अन्त और मध्य स्थानोंकी विचित्रतासे व्यामोह
उत्पन्न किया गया है । अतः सङ्ख्याताके समान प्रहेलिकाका स्थान-
कथनवैचित्र्यमूलक नूतन प्रकार है ।