काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
पृष्ठ 150, कुल 270 में से
संदर्भ में पढ़ें३।१००-१०२] ४. प्रहेलिकाके भेद १२७
(६) परुषा लक्षणास्तित्व-मात्र-व्युत्पादित-श्रुतिः ॥१००॥
(७) सङ्ख्याता नाम सङ्ख्यानं यत्र व्यामोहकारणम् ।
(८) अन्यथा भासते यत्र वाक्यार्थः, सा प्रकल्पिता ॥ १०१ ॥
(६) सा नामान्तरिता यस्या नाम्नि नानाऽर्थकल्पना ।
(६) पदोंके निरूपक शास्त्र (व्याकरण) के सद्भाव मात्रसे व्युत्पन्न किये
गये पदों वाली परुषा होती है ॥ १०० ॥
(७) जिसमें गिनती उलझाने वाली होती है, वह सङ्ख्याता है ।
(८) जहाँ वाक्यका अर्थ (इष्टसे) भिन्न प्रकारसे प्रतीत होता है, वह
प्रकल्पिता है ॥ १०१ ॥
(६) वह (पहेली) नामान्तरिता (दूसरे नामपदसे युक्त) होती है, जिसके
नाम (सञ्ज्ञापद) में विभिन्न (अनेक) अर्थोंकी कल्पना होती है ।
(६) परुषा जिस प्रहेलिकामें ऐसे शब्दोंका प्रयोग किया जाता है,
जिनका लोकमें प्रयोग नहीं होता । शब्दोंके व्युत्पादक शास्त्र व्याकरणके
सूत्रोंमें उनकी व्युत्पत्ति अवश्य प्रतिपादित होती है । व्यवहार और काव्यके
क्षेत्रसे बाहरके शास्त्राभ्याससे ही ज्ञेय ऐसे शब्द कोमलमति लोगोंको चावलमें
कंकड़की तरह कठोर लगते हैं । अतः इस प्रकारके प्रयोग जब विनोदार्थ किये
जायें, तो वे कोमलमति नागरिकोंको खूब व्यामूढ करते हैं । प्रहेलिकाका उप-
योग ही परव्यामोहनार्थ है । इस लिये ऐसे प्रयोग प्रहेलिकामें शोभाकारक
होते हैं । काव्यके सामान्य प्रकारमें भले ये प्रयोग दोष माने जाते हैं । यह
अर्थगूढताका ही एक प्रकार है । उदाहरण ११३वें श्लोकमें देखें ॥ १०० ॥
(७) सङ्ख्याता—जिस उक्तिमें गिनती उलझानेवाली होती है, उसे
‘सङ्ख्याता’ प्रहेलिका कहा जाता है । ‘सङ्ख्या’ अर्थ है । अतः यह पहेली भी
अर्थगूढा है । इसका उदाहरण ११४वें श्लोकमें है ।
(८) प्रकल्पिता—जिस उक्तिमें वाक्यार्थ विवक्षितसे अन्य रूपमें भासित
होता है, वह वास्तविक नहीं होता । जानबूझकर अर्थान्तरका आभास करानेके
कारण उस उक्तिको ‘प्रकल्पिता’ प्रहेलिका कहा जाता है । यह भी अर्थगूढा
है । इसका उदाहरण ११५वें श्लोकमें है ॥ १०१ ॥
(६) नामान्तरिता—जिस उक्तिमें प्रयुक्त नाम (सञ्ज्ञा) पदोंमें अनेक
अर्थोंकी कल्पनाकी जाती है, उसे ‘नामान्तरिता’ प्रहेलिका कहा जाता है ।