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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

३. अरण्यकाण्ड (पंचवटी व शूर्पणखा प्रसंग)

कवितावली ६०
वारिधि बँधाइ सेतु ऐहैं भानुकुलकेतु
सानुज कुसल कपिकटकु वटोरि कै॥
बचन विनीत कहि, सीताको प्रबोधु करि,
'तुलसी' त्रिकूट चढ़ि कहत डफोरि कै।
'जै जै जानकीस दससीस-करि-केसरी'
कपीसु कूद्यो बात-घात उदधि हलोरि कै ॥२७॥
'मातः ! धैर्य धारण करो। आपको छः-सात दिन बीतते
कुछ मालूम न होंगे। अब शत्रुके नाशकी अवधि थोड़ी ही रह गयी
है। भाईके सहित सूर्यकुलकेतु ( श्रीरामचन्द्रजी) वानरसेना
एकत्रित कर, समुद्रमें पुल बाँध यहाँ ( शीघ्र ही) सकुशल पधारेंगे।'
इस प्रकार नम्र वचन कह, जानकीजीको समझाकर हनुमान्‌जी
त्रिकूट पर्वतपर चढ़ गये और बड़े जोरसे चिल्लाकर बोले—
'रावणरूप गजराजके लिये मृगराजतुल्य जानकीवल्लभ (भगवान्
श्रीराम) की जय हो।' (ऐसा कहकर) कपिराज (श्री-
हनुमान्‌जी) वायुके आघातसे समुद्रमें हिलोरें उत्पन्न करते हुए
(समुद्रके उस पार) कूद गये।
साहसी समीरसनु नीरनिधि लंघि, लखि
लंक सिद्धपीठु निसि जागो है मसानु सो।
'तुलसी' बिलोकि महासाहसु प्रसंन भई
देबी सीय-सारिखी, दियो है बरदानु सो॥
बाटिका उजारि, अच्छधारि मारि, जारि गढ़,
भानुकुलभानुको प्रतापभानु-भानु-सो।

६१ सुन्दरकाण्ड
करत बिसोक लोक-कोकनद, कोक कपि,
कहै जामवंतु, आयो, आयो हनुमानु सो ॥२८॥
साहसी वायुनन्दनने समुद्रको लाँघ और लङ्कारूपी सिद्धपीठको
जान उसमें रातभर मसान-सा जगाया है । उनके इस महान्
साहसको देख श्रीजानकीजी-जैसी देवी प्रसन्न हुईं और उन्हें
वरदान दिया । उस समय जाम्बवान् कहने लगे—‘वाटिकाको
उजाड़, अक्षयकुमारकी सेनाका संहार कर और फिर लङ्काको जलाकर
भानुकुलभानु श्रीरामचन्द्रके प्रतापरूप सूर्यकी किरणके समान
लोकरूपी कमल और वानररूपी चक्रवाकोंको शोकरहित करते
हनुमान्‌जी आ गये, आ गये ।'
गगन निहारि, किलकारी भारी सुनि, हनु-
मान पहिचानि भये सानँद सचेत हैं ।
बूडत जहाज बच्यो पथिकसमाजु, मानो
आजु जाए जानि सब अंकमाल देत हैं ॥
‘जै जै जानकीस, जै जै लखन-कपीस’ कहि,
कूदैं कपि कौतुकी नटत रेत-रेत हैं ।
अंगदु मयंदु नलु नील बलसील महा
बालधी फिरावैं, मुख नाना गति लेत हैं ॥२९॥
· किलकारीके उच्च शब्दको सुनकर (सब वानर और भालू )
आकाशकी ओर देखने लगे और हनुमान्‌जीको पहचानकर
आनन्दित और सचेत हो गये । मानो जहाजके साथ पथिकोंका
समाज डूबता-डूबता बच गया । वे सब आज अपना नया जन्म

कवितावली ६२
जान एक दूसरेसे गले लगकर मिलने लगे। 'जय जानकीश, जय
जानकीश, जय लक्ष्मणजी, जय सुग्रीव' ऐसा कहते हुए वे कौतुकी
वानर कूदते हैं और समुद्रकी रेतीपर नाचते हैं। बलशाली अङ्गद,
मयन्द, नील, नल—ये सब अपनी विशाल पूँछोंको घुमाते हैं और
अनेक प्रकारसे मुँह बनाते हैं।
आयो हनुमानु प्रानहेतु, अंकमाल देत,
लेत पगधूरि एक, चूमत लँगूल हैं।
एक बूझें बार-बार सीय-समाचार, कहें
पवनकुमारु, भो विगत-श्रम-सूल हैं॥
एक भूखे जानि, आगें आनैं कंद-मूल-फल,
एक पूजैं बाहु बलमूल तोरि फूल हैं।
एक कहैं 'तुलसी' सकल सिधि ताकें, जाकें
कृपा-पाथनाथ सीतानाथु सानुकूल हैं॥३०॥
अपने प्राणोंकी रक्षा करनेवाले हनुमान्‌जीको आया देख कोई
उनसे गले लगकर मिलते हैं, कोई चरणधूलि लेते हैं, कोई पूँछ
चूमते हैं, कोई बार-बार जानकीजीके समाचार पूछते हैं। जिन्हें
कहनेहीसे हनुमान्‌जीकी सारी थकावट और व्यथा जाती रही।
कोई हनुमान्‌जीको भूखे जान उनके आगे कन्द-मूल-फल लाकर
रख देते हैं। कोई फूल तोड़कर हनुमान्‌जीकी बलशालिनी भुजाओंका
पूजन करते हैं। कोई कहते हैं कि कृपासिन्धु सीतानाथ जिसके
ऊपर अनुकूल हैं उसके सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं।
सीयको सनेहु, सीलु, कथा तथा लंकाकी
कहत चले चायसों, सिरानो पथु छनमें।

६३ सुन्दरकाण्ड

कह्यो जुवराज बोलि बानरसमाजु, आजु
खाहु फल, सुनि पेलि पैठे मधुबनमें ॥
मारे बागवान, ते पुकारत देवान गे,
'उजारे बाग अंगद', देखाए घाय तनमें ।
कहै कपिराजु, करि काजु आये कीस, तुल-
सीसकी सपथ, महामोदु मेरे मनमें ॥३१॥

फिर वे सब श्रीजानकीजीके प्रेम और शीलकी तथा लङ्काकी
कथा बड़े चावसे कहते हुए चले, (जिससे) क्षणमात्रमें रास्ता
समाप्त हो गया । [किष्किन्धा में पहुँचनेपर] युवराज (अङ्गद) ने
कपिसमाजको बुलाकर कहा, 'आज सब लोग फल खाओ।' यह
सुनकर वे सब-के-सब बलपूर्वक मधुवनमें घुस गये । उन्होंने जिन
बागवानोंको मारा, वे पुकारते हुए दरबारमें गये और शरीरमें घाव
दिखाकर कहने लगे कि युवराज अङ्गदने बागोंको उजाड़ दिया
और [हमलोगोंको मारा], तब सुग्रीवने कहा - तुलसीके स्वामी
(श्रीरामचन्द्रजी) की शपथ है, आज मेरे मनमें बड़ा आनन्द है;
मालूम होता है, वानरगण कार्य कर आये हैं ।

भगवान् रामकी उदारता

नगरु कुबेरको सुमेरुकी बराबरी,
विरंचि-बुद्धिको विलासु लंक निरमान भो ।
ईसहि चढ़ाइ सीस बीसबाहू बीर तहाँ,
रावनु सो राजा रज-तेजको निधानु भो ॥

कवितावली [L1b] ६४
'तुलसी' तिलोककी समृद्धि, सौंज, संपदा
सकेलि चाकि राखी रासि, जाँगरु जहानु भो।
तीसरे उपास बनवास सिंधु पास सो
समाजु महाराजजू को एक दिन दानु भो ॥३२॥

कुबेरकी पुरी लङ्का (स्वर्णमय होनेके कारण) सुमेरुके समान
है। वह मानो ब्रह्माकी बुद्धिका कौशल ही बनकर खड़ा हो गया
है। वहाँ राजसी तेजकी खान, बीस भुजाओंवाला रावण श्रीमहादेव-
जीको अपने मस्तक चढ़ाकर राजा हुआ। तुलसीदासजी कहते
हैं—मानो तीनों लोकोंकी विभूति, सामग्री और सम्पत्तिकी राशिको
एकत्रित कर यहीं चाँक लगाकर (सीमा बाँधकर) रख दी है
तथा इसीका भूसा आदि सारा संसार बन गया। यही सारी
सम्पत्ति वनवासी महाराज रामजीको समुद्रतटपर तीन दिन
उपवास करनेके बाद [ विभीषणको देते समय ] एक दिनका
दान हो गयी।

इति सुन्दरकाण्ड

लंकाकाण्ड
राक्षसोंकी चिन्ता
बड़े बिकराल भालु-बानर बिसाल बड़े,
'तुलसी' बड़े पहार लै पयोधि तोपिहैं।
प्रबल प्रचंड बरिबंड बाहुदंड खंडि
मंडि मेदिनीको मंडलीक-लीक लोपिहैं ॥
लंकदाहु देखें न उछाहू रह्यो काहुन को,
कहैं सब सचिव पुकारि पाँव रोपि हैं।
'बाँचिहै न पाछैं त्रिपुरारिहू मुरारिहू के,
को है रन रारिको जौं कोसलेसु कोपिहैं ॥ १ ॥
लंकाका दाह देखकर किसीका उत्साह नहीं रहा। पीछे सब
मन्त्रिगण प्रणपूर्वक पुकार-पुकारकर कहने लगे—'महाभयानक भालू
और बड़े विशालकाय वानर बड़े-बड़े पहाड़ लाकर समुद्रको तोप
(पाट) देंगे। वे अत्यन्त प्रबल, पराक्रमी और दुर्द्दण्ड वीरोंके
भुजदण्डोंका खण्डन कर, और उनसे पृथ्वीको समलंकृत कर
त्रिभुवनविजयी (रावण) की मर्यादाका लोप कर देंगे।' शिवजी
और विष्णु भगवान्के बचानेपर भी कोई नहीं बचेगा। यदि
श्रीरामचन्द्रजीने क्रोध किया तो उनसे युद्ध करनेवाला भला कौन है ?
क० ५-

कवितावली ६६
त्रिजटाका आश्वासन
त्रिजटा कहत बार-बार तुलसीखरीसों,
'राधौ बान एकहीं समुद्र सातौ सोषिहैं।
सकुल सँघारि जातुधान-धारि, जम्बुकादि,
जोगिनी-जमाति कालिकाकलाप तोषिहैं ॥
राजु दै नेवाजिहैं बजाइ कै बिभीषनै,
बजैंगे ब्योम बाजने विबुध प्रेम पोषिहैं।
कौन दसकंधु, कौन मेघनादु बापुरो,
को कुंभकर्नु कीटु, जब रामु रन रोषिहैं' ॥ २ ॥
त्रिजटा राक्षसी तुलसीदासकी स्वामिनी श्रीजानकीजीसे बार-बार
कहती है कि श्रीरामचन्द्रजी एक ही बाणसे सातों समुद्रोंको सोख
लेंगे। वे राक्षससेनाका कुलसहित संहार कर गीदड़ों, योगिनियों और
कालिकाओंके समूहोंको तृप्त करेंगे। वे डंकेकी चोट विभीषणको
राज्य देकर उसपर अनुग्रह करेंगे। उस समय आकाशमें बाजे बजने
लगेंगे और देवतालोग प्रेमसे पुष्ट हो जायँगे । जब युद्धक्षेत्रमें
श्रीरघुनाथजी कुपित होंगे तब भला रावण क्या चीज़ है, बेचारा
मेघनाद भी किस गिनतीमें है और कीटतुल्य कुम्भकर्ण भी क्या है।
बिनय-सनेह सों कहति सिय त्रिजटासों,
पाए कछु समाचार आरजसुवनके ।
पाए जू, बँधायो सेतु, उतरे भानुकुलकेतु,
आए देखि-देखि दूत दारुन दुवनके॥

६७ लंकाकाण्ड
वदन मलीन, बलहीन, दीन देखि, मानो
मिटे घटे तमीचर-तिमिर भुवनके ।
लोकपति-कोक-सोक मूँदे कपि-कोकनद,
दंड द्वै रहे हैं रघु-आदित-उवनके ॥ ३ ॥
श्रीजानकीजी विनय और प्रेमपूर्वक त्रिजटासे कहती हैं कि
'क्या आर्यपुत्रके कोई समाचार मिले ?' त्रिजटा बोली—'हाँ जी,
पाये हैं; भानुकुलकेतु ( श्रीरामचन्द्र ) समुद्रपर पुल बाँधकर इस पार
उतर आये । घोर राक्षस ( रावण ) के दूत यह सब देख-देखकर
आये हैं । उन लोगोंके मुख मलिन हो गये हैं और वे बलहीन तथा
दीन हो गये हैं । मानो चौदहों भुवनका राक्षसरूपी अन्धकार मिटना
और घटना चाहता है । इन्द्रादि लोकपालरूप चक्रवाकोंकी शोक-
निवृत्ति और वानरसेनारूप मुँदे हुए कमलोंकी प्रफुल्लताके लिये
श्रीरामरूप सूर्यके उदित होनेमें केवल दो ही दण्ड ( घड़ी ) काल
रह गया है ।
झूलना
सुभुजु मारीचु खरु त्रिसिरु दूषनु बालि,
दलत जेहि दूसरो सरु न साँध्यो ।
आनि परबाम बिधि बाम तेहि रामसों
सकत संग्रामु दसकंधु काँध्यो ॥
समुझि तुलसीस-कपि-कर्म घर-घर घैरु,
बिकल सुनि सकल पाथोधि बाँध्यो ।

कवितावली ६८
बसत गढ़ बंक, लंकेस नायक अछत,
लंक नहि खात कोउ भात राँध्यो ॥४॥
जिसने सुबाहु, मारीच, खर, दूषण, त्रिशिरा और बालिके
मारनेमें दूसरा बाण सन्धान नहीं किया, उन्हीं रघुनाथजीसे विधिकी
वामताके कारण परस्त्रीको ले आकर क्या रावण युद्ध ठान सकता
है ? तुलसीदासके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीके और हनुमान्‌जीके कार्यों-
का स्मरण करके घर-घर (रावणकी) बदनामी होती रहती है ।
तथा समुद्र बाँधनेका समाचार सुनकर सब लोग व्याकुल हो गये हैं।
(लंका-जैसे) विकट गढ़में निवास करते और रावण-जैसे (दुर्दान्त)
शासकके रहते हुए भी लंकामें कोई पकाया हुआ भात नहीं खाता
[क्योंकि उन्हें हर समय आग लगनेका भय बना रहता है]।
'बिस्वजयी भृगुनायक-से बिनु हाथ भए हनि हाथ हजारी ।
बातुल मातुलकी न सुनी सिख का 'तुलसी' कपि लंक न जारी ॥
अजहूँ तौ भलो रघुनाथ मिलें, फिरि बूझिहै, को गज, कौन गजारी।
कीर्ति बड़ो, करतूति बड़ो, जन-बात बड़ो, सो बड़ोई बजारी ॥५॥
[ लंकापुरीमें रहनेवाले नर-नारी कहते हैं—] हजार
भुजाओंवाले (सहस्रार्जुन) को मारनेवाले परशुराम-जैसे विश्व-
विजयी वीर भी (इन रघुनाथजीके सामने) निहत्थे हो गये ।
देखो, इस पागल रावणने अपने मामा (माल्यवान्) की भी शिक्षा
नहीं मानी; तो तुलसीदासजी कहते हैं क्या हनुमान्‌जीने लंकाको
नहीं जलाया ? यदि यह श्रीरघुनाथजीसे मेल कर ले तो अब भी अच्छा
है। नहीं तो फिर मालूम हो जायगा कि कौन हाथी है और कौन

४९ लंकाकाण्ड
सिंह है ? इस (रावण) की कीर्ति बड़ी है, करनी बड़ी है
और जनतामें बात भी बड़ी है, परन्तु यह है बड़ा बजारा
(बकवादी*) ।
समुद्रोत्चरण
जब बाहन भे बनबाहन-से, उतरे बनरा, 'जय राम' रढैं।
'तुलसी' लिएँ सैल-सिला सब सोहत, सागरु ज्यों बल बारि बढ़ें॥
करि कोपु करें रघुबीरको आयसु, कौतुक हीं गढ़ कूदि चढ़े।
चतुरंग चमू पलमें दलि कैं रन रावन-राइ-सुहाड़ गढ़े ॥ ६ ॥
जब [ सेतु बाँधते समय ] पत्थर नावके समान हो गये, तब
वानरलोग समुद्रपार उतर आये और 'रामचन्द्रजीकी जय' कहने
लगे। गोसाईंजी कहते हैं—वे सब हाथोंमें पर्वत और शिलाएँ
लिये ऐसे सुशोभित हो रहे हैं जैसे ज्वार आनेपर समुद्र सुशोभित
होता है। वे बड़ा क्रोध करके श्रीरामचन्द्रजीका आज्ञाका पालन करते
हैं, खेलहीसे कूदकर लंका-गढ़पर चढ़ गये हैं, मानो एक ही पलमें
युद्धमें चतुरंगिणी सेनाको नष्टकर दुष्ट रावणकी सुदृढ़ हड्डियोंका
मरम्मत कर डालेंगे।
बिपुल बिसाल बिकराल कपि-भालु, मानो
कालु बहु बेष धरें, धाए किएँ करषा ।
लिए सिला-सैल, साल, ताल औ तमाल तोरि,
तोपैं तोयनिधि, सुरको समाजु हरषा ॥
डगे दिगकुंजर, कमठ कोलू कलमलै,
डोले धराधर धारि, धराधरु धरषा ।

  • बजारीका अर्थ दलाल या मिथ्यावादी भी हो सकता है ।