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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 228 में से

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पृष्ठ 36

३३ अयोध्याकाण्ड
ये श्याम और गौरवर्ण बालक स्वभावसे ही सुन्दर हैं,
इन्होंने मनोहरतामें कामदेवको भी जीत लिया है । ये धनुष-बाण
लिये और तरकस कसे हुए हैं, इनके सिरपर जटाएँ सुशोभित
हैं और इन्होंने मुनियोंका-सा वेष बना रखा है । साथमें चन्द्र-
बदनी स्त्रीको लिये हैं, जिसने रतिको अपना थोड़ा-सा रूप दे
रक्खा है । [ इन्हें देखकर ] हृदय सकुचाता है कि इनके पैरोंमें
जूते भी नहीं हैं, ये पैदल कैसे चलेंगे ?
रानी मैं जानी अयानी महा, पबि-पाहनहू तें कठोर हियो है।
राजहुँ काजु अकाजु न जान्यो, कह्यो तियको जेहि कान कियो है॥
ऐसी मनोहर मूरति ए, बिछुरें कैसे प्रीतम लोगु जियो है।
आँखिनमें सखि ! राखिबे जोगु, इन्हें किमि कैबनबासु दियो है २०
मैंने जान लिया कि रानी महामूर्ख है, उसका हृदय वज्र
और पत्थरसे भी कठोर है । राजाको भी कर्तव्य-अकर्तव्यका
ज्ञान नहीं रहा, जिन्होंने स्त्रीके कहे हुएपर कान दिया । अरे !
इनकी मूर्ति ऐसी मनोहारिणी है; भला इन लोगोंका वियोग होने-
पर इनके प्रिय लोग कैसे जीते होंगे ? हे सखि ! ये तो आँखोंमें
रखने योग्य हैं; इन्हें वनवास क्यों दिया गया है ?
सीस जटा, उर-बाहु बिसाल, बिलोचन लाल, तिरीछी-सी भौंहैं।
तून सरासन-बान धरें तुलसी वन-मारगमें सुठि सोहैं ॥
सादर बारहिं बार सुभायँ चितै तुम्ह त्यों हमरो मनु मोहैं।
पूँछति ग्रामबधू सिय सों, कहौ, साँवरे-से, सखि रावरे को हैं २१
तुलसीदासजी कहते हैं—श्रीसीताजीसे गाँवकी स्त्रियाँ
पूछती हैं—'जिनके सिरपर जटाएँ हैं, वक्षःस्थल और भुजाएँ
विशाल हैं, नेत्र अरुणवर्ण हैं, भौंहें तिरछी हैं, जो धनुष-बाण
क० ३—