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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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कवितावली ३२
और काम) सुन्दर तपस्वियोंका वेष बनाये पथिकरूपसे मार्गमें
लोगोंके नेत्रोंको सफल करने चले हैं।
बनिता बनी स्यामल गौरके बीच,
बिलोकहु, री सखि ! मोहि-सी है।
मगजोगु न कोमल, क्यों चलिहै,
सकुचाति मही पदपंकज छ्वै॥
तुलसी सुनि ग्रामवधू थिथकीं,
पुलकीं तन, औ चले लोचन च्वै।
सब भाँति मनोहर मोहनरूप
अनूप हैं भूपके बालक द्वै॥१८॥
[एक ग्रामीण स्त्री अन्य स्त्रियोंसे कहती है-] 'अरी सखि!
साँवरे और गोरे कुँवरके बीचमें एक स्त्री विराजमान है, उसे तनिक
मेरे समान होकर देखो। वह बड़ी कोमल है, मार्गमें चलनेयोग्य
नहीं है कैसे चलेगी। फिर इसके (कोमल) चरणकमलोंका स्पर्श
करके तो पृथ्वी भी सकुचाती है।' गोसाईंजी कहते हैं कि उसकी
बातें सुनकर सब ग्रामकी स्त्रियाँ थकित हो गयीं, उनके शरीर
पुलकित हो गये और नेत्रोंसे जल बहने लगा। [सब कहने लगीं
कि] ये दोनों राजकुमार सब प्रकार मनोहर, मोह लेनेवाले और
अनुपम सुन्दर हैं।
साँवरे-गोरे सलोने सुभायँ, मनोहरताँ जिति मैनु लियो है।
बान-कमान, निषंग कसें, सिर सोहैं जटा, मुनिबेषु कियो है॥
संग लिएँ बिधुबैनी बधू, रतिको जेहि रंचक रूपु दियो हैं।
पायन तौ पनहीं न, पयादेंहि क्यों चलिहैं, सकुचात हियो है।१९।