कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकवितावली २२५
लागैगी पै लाज वा विराजमान विरुदहि,
महाराज ! आजुजौं न देत दादि दीनकी ॥१७७॥
एक तो सारे दुःखोंका मूलभूत यह भयंकर कलिकाल और
उसमें भी कोढ़में खाजके समान मीनराशिपर शनैश्चरकी स्थिति है।
इसीसे इस समय वेद-धर्म तो लुप्त हो गये हैं, लुटेरे ही राजा हो गये
तथा बढ़े हुए पापकी गति देखकर साधुजन दुखी हैं। हे दयाधाम
भगवान्-सम ! दुर्बल पुरुषोंके लिये कोई दूसरा द्वार नहीं है, बल-
वैभवशून्य पुरुषोंको तो एकमात्र आपकी ही गति है। हे महाराज !
यदि इस समय आपने इन दीनोंकी सहायता न की तो आपके उस
(सर्वोपरि) विराजमान विरदको लज्जित होना पड़ेगा।
विविध
रामनाम मातु-पितु, स्वामि समरथ, हितु,
आस रामनामकी, भरोसो रामनामको।
प्रेम रामनामहीसों, नेम रामनामहीको,
जानों ना मरम पद दाहिनो न वामको ॥
स्वारथ सकल परमारथको रामनाम,
रामनाम हीन तुलसी न काहू कामको।
रामकी सपथ, सरबस मेरें रामनाम,
कामधेनु-कामतरु मोसे छीन-छामको ॥१७८॥
रामनाम ही मेरा माता-पिता है, वही मेरा समर्थ स्वामी और
हितकारी है, मुझे रामनामसे ही सब प्रकारकी आशा है और राम-
नामका ही भरोसा है। रामनामसे ही मेरा प्रेम है और रामनाम