कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 222, कुल 228 में से
संदर्भ में पढ़ें२१९ उत्तरकाण्ड
उछरत उतरात हहरात मरि जात,
भभरि भगात जल-थल मीचुमई है॥
देव न दयाल, महिपाल न कृपालुचित,
बारानसीं बाढ़ति अनीति नित नई है।
पाहि रघुराज ! पाहि कपिराज रामदूत !
रामहूकी विगरी तुहीं सुधारि लई है ॥१७६॥
इस शिवपुरीरूप सरोवर के नर-नारीरूप समस्त जलचर बड़े व्याकुल
हैं; यह महामारी उनके लिये माजा* हो रही है । वे उछलते हैं,
तैरते हैं, घबड़ाकर भागते हैं और हाय-हाय करके मर जाते हैं। इस
प्रकार सारा जल-थल मृत्युमय हो रहा है। इस समय देवतालोग
दया नहीं करते तथा राजालोग भी कृपालुचित्त नहीं हैं। अतः
वाराणसीमें नित्य-नवीन अन्याय बढ़ रहा है। हे रघुराज ! रक्षा
कीजिये । हे वानरराज हनुमान्जी ! रक्षा कीजिये; भगवान् रामकी
बात बिगड़नेपर भी आपहीने उसे सँभाला था ; अतः यहाँ भी आप
ही कृपा कीजिये ] ।
एक तौ कराल कलिकाल सूल-मूल, तामें
कोढ़मेंकी खाजुसी सनीचरी है मीनकी ।
वेद-धर्म दूरि गए, भूमि चोर भूप भए,
साधु सीद्यमान जानि रीति पाप पीनकी ॥
दूबरेको दूसरो न द्वार, राम दयाधाम !
रावरीऐ गति बल-विभव बिहीन की ।
- जलचरोंमें होनेवाला एक प्रकारका रोग ।