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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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पृष्ठ 198

१०९२ उत्तरकाण्ड
नया उसके जलकी धारारूप बाणोंको अपने करकमलोंसे धैर्य-
पूर्वक धारण करेंगे ।
लागि दवारि पहार ठर्हा, लहकी कपि लंक जथा खरखौंकी ।
चारु चुआ चहुँ ओर चलैं, लपटैं-झपटैं सो तमीचर तौंकी ॥
क्यौं कहि जात महासुषमा, उपमा तकि ताकत है कवि कौंकी ।
मानो लसी तुलसी हनुमान-हिएँ जगजीति जरायकी चौकी १४३
[ एक समय चित्रकूटमें दावाग्नि लगी; गोसाईंजी अब उसी-
का वर्णन करते हैं—] इस समय चित्रकूटमें ठठकर दावानल
लगी हुई है और इस प्रकार प्रज्वलित हो रही है जैसे हनुमान्-
जी ने लङ्कामें आग लगायी थी । दावाग्निके तापसे तपकर सुन्दर
पशु चारों ओरको इस तरह भागे जाते हैं जैसे लङ्कामें आगकी
ज्वालाओंकी लपकसे त्राँसे हुए राक्षस लोग इधर-उधर भागे
थे । उस समयकी महान् शोभाका वर्णन किस प्रकार किया जाय ?
उसकी उपमाको विचारता हुआ कवि बड़ी देरसे ताकता रह
गया है [ परन्तु उसे इसके अनुरूप कोई उपमा नहीं मिलती ]
ऐसा जान पड़ता है मानो हनुमान्‌जीके वक्षःस्थलपर संसारको
जीतनेका जड़ाऊ पदक ( तमगा ) सुशोभित हो ।
तीर्थराजसुषमा
देव कहैं अपनी-अपना, अवलोकन तीरथराजु चलो रे ।
देखि मिटैं अपराध अगाध, निमज्जत साधु-समाजु मलो रे ॥
सोहै सितासितको मिलिबो, तुलसी हुलसै हिय हेरि हलोरे ।
मानो हरे तृन चारु चरैं बगरे सुरधेनुके धौल कलोरे ॥१४४॥
देवता लोग आपसमें कहते हैं—अरे ! तीर्थराज प्रयागका