कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)
Kavitavali with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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जहाँका वन अति पवित्र है, और पशु-पक्षी अत्यन्त सुहावने
हैं तथा जिसे खेतके टुकड़ेके समान (हरा-भरा) देखकर बड़ा
आनन्द होता है; जहाँ सीता, राम और लक्ष्मणका निवास था.
जहाँ अनेकों मुनिजन रहते हैं तथा जो सिद्ध, साधु और साधकों-
के लिये विवेकरूपी वृक्षके समान है; जहाँ सबा झरनोंसे अति
शीतल और पवित्र जल झरता रहता है तथा मन्दाकिनी नदी
श्रीमहादेवजीके जटाजूटके समान जान पड़ती है । तुलसीदासजी
कहते हैं—यदि तुम्हें भगवान् रामके सच्चे स्नेहकी चाह है तो
प्रेमपूर्वक अद्भुत चित्रकूटका सेवन करो ।
मोह-वन कलिमल-पल-पीन जानि जियँ
साधु-गाइ-विप्रनके भयको नेवारिहै।
दीन्ही है रजाइ राम, पाइ सो सहाइ लाल
लखन समत्थ बीर हेरि हेरि मारिहै॥
मंदाकिनी मंजुल कमान असि, बान जहाँ
धारि-धार धीर धरि सुकर सुधारिहै।
चित्रकूट अचल अहेरि बैठ्यो घात मानो
पातकके ब्रात घोर सावज सँघारिहै ॥१४२॥
मोहरूपी वनमें पापराशिरूप सावज (हिंस्र पशु) कलि-
कल्मषरूप मांससे मोटे हो रहे हैं, ऐसा चित्तमें जानकर श्रीरघु-
नाथजीने आज्ञा दी है; अतः समर्थ वीर लखनलालकी सहायता
पा चित्रकूट अचल अहेरी होकर उनकी घातमें बैठे हुए हैं। वे
उन्हें ढूँढ-ढूँढ़कर मारेंगे तथा इस प्रकार साधु, गौ और ब्राह्मणोंके
भयको हटायेंगे । उसके लिये वे मन्दाकिनी-जैसी मनोहर कमान