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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 228 में से

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पृष्ठ 182

मसक हूँ कहै, 'भार मेरे मेरु हालिहैं' ॥
तुलसी यही कुभाँति घने घर घालि आई,
घने घर घालति हैं, घने घर घालिहैं।
देखत-सुनत-समुझतहू न सूझै सोई,
कबहुँ कह्यो न कालहू को कालु कालि हैं ॥१२०॥
कुचाली लोग कहते हैं—मुझे कल ही तरुण शरीर प्राप्त
हो जायगा, कल ही भूमि और धन प्राप्त हो जायेंगे और कल
ही मैं युद्धमें विजय प्राप्त कर लूँगा, कल ही मैं अपने सारे कार्य
सिद्ध कर लूँगा और कल ही मैं राज-समाज जोड़ दूँगा।
मच्छरके समान होकर भी वे कहते हैं, मेरे बोझसे मेरु पर्वत
भी हिल जायगा। तुलसीदासजी कहते हैं—इस कुप्रवृत्तिके
कारण बहुत-से घर नष्ट हो गये हैं, इस समय भी नष्ट होते हैं
तथा आगे भी होंगे। परन्तु यह सब देख, सुन और समझकर
भी वह कुप्रवृत्ति लोगोंको दीख नहीं पड़ती और न किसीने
कभी यह कहा कि काल (आयु) का भी काल (अन्त)
कल ही है।

रामभक्तिकी याचना
भयो न त्रिकाल तिहुँ लोक तुलसी-सो मंद
निंदैं सब साधु, सुनि मानौं न सकोचु हौं।
जानत न जोगु, हियँ हानि मानैं जानकीसु,
काहे को परेखो, पापी प्रपंची पोचु हौं॥
पेट भरिबेके काज महाराज-को कहायौ
महाराजहूँ कह्यो है प्रनत-बिमोचु हौं।