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कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

कवितावली (सटीक - गीताप्रेस)

Kavitavali with Commentary - Gita Press

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariBrajpublished228 पृष्ठ

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कवितावली १७८
वेष सुबनाइ सुचि वचन कहैं चुबाइ
जाइ तौ न जरनि धरनि-धन-धामकी ।
कोटिक उपाय करि लालि पालिअत देह,
मुख कहिअत गति रामहीके नामकी ॥
प्रगटैं उपासना, दुरावैं दुरवासनाहि,
मानस निवासभूमि लोभ-मोह-कामकी ।
राग-रोष-ईरिषा-कपट-कुटिलाई भरे
तुलसी-से भगत भगति चहैं रामकी ॥११९॥
जो लोग उत्तम (साधुका-सा) वेष बनाकर पवित्र एवं
अमृत चूते हुए वचन बोलते हैं, किन्तु जिनके हृदयसे पृथ्वी,
धन और घरकी आग (तृष्णा) दूर नहीं होती; जो करोड़ों
उपाय करके शरीरका लालन-पालन करते हैं, किन्तु मुखसे
कहते हैं कि हमें तो केवल रामनामका ही भरोसा है; जो अपनी
उपासनाको तो प्रकट करते हैं; किन्तु अपनी बुरी वासनाओंको
छिपाते हैं तथा जिनके चित्त लोभ, मोह और कामके निवास-
स्थान बने हुए हैं, तुलसीदास कहते हैं—वे आसक्ति, क्रोध,
ईर्ष्या, कपट और कुटिलतासे भरे हुए मेरे-जैसे भक्त भी रामकी
भक्ति चाहते हैं ! [अर्थात् जो पुरुष ऐसे कुटिल आचरण
करते हुए भी भगवान्‌को रिझानेकी आशा रखते हैं, वे बड़े
ही हास्यास्पद हैं ।]
कालिहीं तरुन तन, कालिहीं धरनि-धन,
कालिहीं जितौंगो रन, कहत कुचालि है ।
कालिहीं साधौंगो काज, कालिहीं राजा-समाज,