कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
( २ )
कतिपय रोगों का नाम—कोष्ठबद्ध ( कब्ज ), अतीसार ( बहुत दस्त होना
या आंव ), पाण्डु ( कामला ), तक्षण ( कठिन ज्वर ), काश, पामन् ( चर्मरोग,
खुजली ), बलास ( क्षयरोग, थैसिस ) कुष्ठ व्याधि, रक्त स्राव ( खून बहना )
प्रस्त्राव बन्द ( पेशाबबन्द), वक्षःपीड़ा, क्षेत्रिय रोग ( Hiriditary diseases )
गठिया ( पक्षाघात ) कृमिरोग ( मनुष्य का ), कृमिरोग ( पशुका ) ।
नष्टवीर्य, विष, सर्पविष, क्षत ( जखम ) नेत्र की बीमारी, बालों का उड़-
जाना, शोथ, गण्डमाला, शूल रोग, यक्ष्मा ( तपेदिक ), पागलपन, धातुक्षीणता,
वातव्याधि। इत्यादि अनेक रोग जिनका इलाज करने पर भी भला नहीं होता हो।
पाञ्चभौतिक शरीर या स्थूल शरीर, लिङ्गशरीर और कारण शरीर—ये तीन
शरीर होते हैं । आयुर्वेद, एलो पैथिक, होमिओपैथिक आदि का जो इलाज या दवा
करायी जाती है वह केवल भौतिक वा स्थूल शरीर का ही इलाज होता है । यह
बात जानने की है जो रोग तीन प्रकार से अच्छा किया जाता है । दवा देकर
( खिलाकर, सूंघाकर, लगाकर, सूई देकर, घाव को चीर कर, मलहमादि से )
यह तो हुआ एक प्रकार । दूसरा प्रकार मन्त्रों से झाड़ कर, तीसरा यन्त्र वा एक
जड़ी के उपयोग से पहिले प्रकार से जो इलाज होता है वह कम सफल होता-प्रत्युत
अनाड़ी वैद्य, डाक्टर से काम पड़ा तो मुक्ति हो जाती है या शरीर बेकार हो जाता,
हमारे आर्य्य पूज्य महर्षियों ने अथर्ववेदादि द्वारा प्रत्येक रोगों को मन्त्रों से यन्त्रों द्वारा
और केवल एक २ जड़ी के उपयोग से छुड़ाने का उपाय बतलाया है आज मुझे ८१
वर्ष की उमर हुई एक समय मुझको चित्रकूट जाने का संयोग हुआ । और वहां
एक मुझे सिद्ध साधु का दर्शन हुआ जो वेद का भी ज्ञाता थे इन से १ सप्ताह संग
हुआ इनके द्वारा हमको हिन्दू धर्म, मन्त्र, तन्त्र, यन्त्रादि का रहस्य मालूम हुआ ।
इन्हीं कारणों से हमने अपने अन्तिम जीवन में जनता की सेवा करने के विचार से
यह विज्ञापन दिया है कि सर्व साधारण इस कार्यालय से पत्र व्यवहार कर इन
अलौकिक शक्ति निहित यन्त्र, मन्त्र, जड़ियों से फायदा उठावें । केवल एक जड़ी
का दाम एवं इसके काम बताते हैं । स्त्रियों को बच्चा जनने समय जो असह्य कष्ट
होता है प्रत्युत बहुतों को मृत्यु तक हो जाया करती । चाहे जिस प्रकार का कष्ट
हो—इस जड़ी से प्रसव दुःख न होकर बच्चा मरा या जिन्दा अवश्य वेदना रहित
दश मिनट के भीतर गर्भ से निकल बाहर हो जावेगा । जड़ी का दाम २॥) डाक
व्यय सहित । इसको पत्थर पर घस कर सूतिका स्त्री अपने दोनों हाथों में लगा
कर ५ मिनट तक एक दृष्टि से देखेगी इतने ही में बच्चा सुख पूर्वक बाहर आयेगा ।
स्मरण रहे कि घड़ी में ५ मिनट से अधिक समय न हो, अन्यथा स्त्री का आन्त्र सहित
बाहर हो जावेगा और-यह जड़ी उपविष है इसलिये शीघ्र ही हाथों को साबुन आदि
( ३ )
से भलीभांति साफ कर लेना चाहिये-दाम २॥) रु० है। इसमें ५ सूतिका का काम
चलेगा और किसी पुरुष के धातु क्षीणता चाहे असाध्य हो, उसका यन्त्र, दवा,
तरकीब दाम ५) और थैसिस-जो १ सालके भीतर का हो । यन्त्र, दवा, तरकीब
१०) । बाकी रोगों का हाल लिखकर जवाबी टिकट या पोस्टकार्ड भेजना । पत्र
लिखते समय रोगी या दुःखी व्यक्ति स्त्री हो या पुरुष उसको उमर, जाति, शरीर
का रंग, स्वभाव हो सके तो उसका फोटो एवं पत्र को उसके दहीने ( पुरुष ) या
बायें हाथ (यदि स्त्री हो) से स्पर्श करा कर भेजना चाहिये । रोगी किस धर्म
को मानने वाला है, मांस खानेवाला है या निरामिष, ईश्वर में उसे विश्वास
है या नास्तिक है। इत्यादि बातें लिखनी चाहिये । लिफाफा के भीतर तीन
पैसे या डेढ़ आने का टिकट जवाब के लिये -)॥ पैसे का टिकट यों ≡)॥ का
टिकट अवश्य भेजना चाहिये । पत्र हिन्दी, संस्कृत या अंग्रेजी में होना चाहिये ।
एवं अपना पता पूरा देना चाहिये ।
ठाकुर गणेशदत्त सिंह,
शास्त्रप्रकाशभवन, मधुरापुर,
डाक, बिद्दूपुर बाज़ार ।
जि. मुज़फ्फरपुर, ( बिहार ) ।
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