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सर्वकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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( २ )
कं. सूत्र पृष्ठ
९-१-११ “अम्बयो यन्ति” आदि सूक्तों का स्पष्टीकरण और शान्त्युदक २१-२२
का तैयार करना ।
अध्याय ॥ २ ॥
१०-१-२४ मेधाजनन, ब्रह्मचारी को ब्रह्मचर्य की सफलता, हवि करने २२-२४
के नियम, बच्चे को शंखपुष्पी आदि का चटाना, जातकर्म
के महोपकारी नियम ।
११-१-२० पौर्णमासी को निर्ऋतिकर्म, ब्रह्मचारी साम्पदकर्म करे । २४-२५
१२-१-१६ सम्पत्ति कामना, सामनस्य के लिये काम्यकर्म ग्रामप्राप्ति २५-२६
एवं सर्वकामना की सिद्धि ।
१३-१-१३ हस्तिवर्चस आदि को विधिपूर्वक यन्त्र बांधने से फल, २६-२७
यक्ष्मा की दवा मेघजल को नियम से लेवे ।
१४-३१ युद्ध का वर्णन, विजय कर्म, इषुनिवारण कर्म, शत्रुसेना २७-३०
की बुद्धिभ्रष्ट करना, उद्वेगकर कर्म ।
१५-१८ जयकर्म, जयपराजय ज्ञान, रोगी जीवेगा ? जानने का यंत्र । ३०-३२
सांग्रामिक विधान, परसेना में किन महारथियों का मरण
होवेगा ? जानना ।
१६-३३ सोमलता को योद्धाओं के हाथ में बांधना, अभयकर्म । सेना ३२-३५
कर्म । राष्ट्र में प्रवेश ।
१७-३४ माण्डलिक राजाओं का अभिषेक और क्षत्रिय को सावित्री ३५-३७
बचवावे ।
अध्याय ॥ ३ ॥
१८-३८ दरिद्रता दूर करने के लिये, मन चाहा धन मांगने वाला ३७-४०
निऋति कर्म करे ।
१९-३१ गोपालनविधि । पुष्टिकर्म । पीयूष की संज्ञा । सर्वकाममणि ४०-४३
शान्ति ।
२०-२६ हल जोलने आदि, खेती सम्बन्धि कर्म, बहुत बैल, गौयें हों ४३-४५
ऐसी इच्छा वाला मनुष्य यह कर्म करे ।
२१-२५ पदार्थवृद्धि कर्म, गोशान्ति कर्म । शान्त वृक्ष की शाखा को ४५-४७
घर में लाकर अमावास्या और पूर्णमासी को रसकर्म करे ।