कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमुक्तः पौष्यामुत्सर्ग उच्यते ॥५॥ अथानध्यायान्वक्ष्यामः
॥६॥ ब्रह्मज्येषु निवर्तते ॥७॥ श्राद्धे ॥८॥ सूतकोत्थान-
च्छर्द्दनेषु त्रिषु चरणम् ॥९॥ आचार्यास्तमिते वा येषां च
मानुषी योनिः ॥१०॥ यथा श्राद्धं तथैव तेषु ॥११॥ सर्वे
च श्राद्धिकं द्रव्यमदसाहव्यपेतं प्रतिगृह्यानध्यायः ॥१२॥
प्राणि चाप्राणि च ॥१३॥ दन्तधावने ॥१४॥ क्षुरसंस्पर्शे
॥१५॥ प्रादुष्कृतेष्वग्निषु ॥१६॥ विद्युताऽर्धरात्रे स्तनिते ॥१७॥
सप्तकृत्वो वर्षेण विरत आप्रातराशम् ॥१८॥ वृष्टे ॥१९॥
निर्घाते ॥२०॥ भूमिचलने ॥२१॥ ज्योतिषोपसर्जन ऋता-
वप्याकालम् ॥ २२ ॥ विषमे न प्रवृत्तिः ॥ २३ ॥ अथ
प्रमाणं वक्ष्यामः समानं विद्युदुल्कयोः। मार्गशीर्षपौषमा-
घापरपक्षेषु तिस्रोऽष्टकाः ॥२४॥ अमावास्यायां च ॥२५॥
त्रीणि चानध्ययनानि ॥२६॥ जनने मरणे चैव दश-
करके, श्रावणी में आरम्भ करना कहा गया और पौष की पौर्णमासी
को पढ़ना छोड़ देवें ॥५॥ अब अनध्यायों को कहेंगे ॥ ६॥ ब्रह्मज्यों में
छोड़े ॥ ९॥ आचार्य सूर्यास्त होने पर या जिनके घर में प्रसव होवे
उनको सूतक तक न पढ़ना चाहिये ॥ १० ॥ जैसा श्राद्ध वैसा ही उनके
लिये भी ॥ ११॥ सब ही श्राद्धिक दशाह तक प्रत्येक गृही को वर्ज्य है
॥१२॥ जीवधारी या अप्राणि हो ॥१३॥ दन्तधावन में, नापित के क्षुर के
संसर्ग में, प्रादुष्कृत अग्नि में, आधी रात को बिजुली कड़कने में
॥१४॥१५॥१६॥१७॥ सात वार तक पढ़ने से विरत रहे जब तक
प्रातःकालिक भोजन हो ॥१८॥ वर्षा होने में, उल्कापात में, भूमिकम्प
में ॥१९॥२०॥२१॥ ज्योतिष ( प्रकाश का छिप जाना ) के उप-
सर्जन में, ऋतु में भी जब तक काल हो ॥२२॥ संकट में प्रवृत्ति न करे
॥२३॥ अब प्रमाण को कहते हैं । बिजुली एवं उल्कापात में समान दोष
है ॥२४॥ अग्रहण, पौष, माघ के अपर पक्षों में तीन अष्टकायें होती हैं
॥२४॥ और अमावास्या में भो ॥२५॥ और तीन ही अनध्याय हैं ॥२६॥