कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
यजन्ते॥१५॥ आवृत इन्द्रमहमिति ॥१६॥ इन्द्र क्षत्रमिति
हविषो हुत्वा ब्राह्मणान् परिचरेयुः ॥१७॥ न संस्थितहो-
माञ्जुहुयादित्याहुराचार्याः ॥१८॥ इन्द्रस्यावभृथादिन्द्र-
मवभृथाय व्रजन्ति ॥१९॥ अपां सूक्तैराप्लुत्य प्रदक्षिण-
मावृत्याप उपस्पृश्यानवेक्षमाणाः प्रत्युदाव्रजन्ति ॥२०॥
ब्राह्मणान् भक्तेनोपेप्सन्ति ॥२१॥ श्वःश्वोऽस्य राष्ट्रं
ज्यायो भवत्येकोऽस्यां पृथिव्यां राजा भवति न पुरा जरसः
प्रमीयते य एवं वेद यश्चैवं विद्वानिन्द्रमहेण चरति ॥
२२॥४॥१४०॥
अथ वेदस्याध्ययनविधिं वक्ष्यामः ॥१॥ श्रावण्यां
प्रौष्ठपद्यां वोपाकृत्यार्धपञ्चमान्मासानधीयीरन् ॥ २ ॥
एवं छन्दांसि ॥३॥ लोम्नां चानिवर्तनम् ॥४॥ अर्धमासं
चोपाकृत्य क्षपेरंस्त्र्यहमुत्सृज्य । आरम्भः श्रावण्या-
रात पूजा करे ॥ १४ ॥ तीन अयन दिनों का उपस्थान करें आहुतियों
से यज्ञ करे ॥ १५ ॥ इन्द्र को घेर, “इन्द्रमहं०” से आहुति करे ।
“इन्द्र क्षत्रं०” से हवियों की आहुति करके, ब्राह्मणों की परिचर्या करें
॥१६॥१७॥ आचार्य्यगण कहते हैं कि संस्थित होर्मों को न करे ॥१८॥
इन्द्र के अवभृथ से इन्द्र के अवभृथ के लिये जावें ॥ १९ ॥ जल सूक्त
से स्नान कर, प्रदक्षिण फेरे लगाकर, जल छूकर, नहीं देखते हुए, आवें
॥ २० ॥ ब्राह्मण चाहें उनको देकर उन्हें प्रसन्न करें ॥ २१ ॥ दिन २
इसका राष्ट्र बढ़े, पृथिवी का राजा होवे और बुढ़ापेसे पहिले इसकी
मृत्यु न होवे। जो ऐसा जानता है और जो विद्वान् इन्द्र महोत्सव जैसा
करता है ॥२२॥४॥१४०॥ यह एकसौ चालीसवी कण्डिका खतम हुई ॥
· अब वेद का अध्ययन विधि को कहेंगे ॥ १ ॥ श्रावण की पौर्णमासी
या भाद्रपद की पौर्णमासी को वेद का उपाकृत्य ( आरम्भ ) कर साढ़े
पाँच महीने पढ़ें ॥ २ ॥ इसी प्रकार छन्दों को पढ़ें ॥ ३ ॥ लोमों को न
कटवावें ॥ ४ ॥ अर्ध मास तक आरम्भ करके तीन दिन पढ़ना बन्द