कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १२५
ऽग्निर्य इमे द्यावापृथिवी अजैष्मेत्यधिपाशानादधाति
॥१९॥ पदे पदे पाशान् वृश्चति ॥२०॥ अधिपाशान्
बाधकाञ्छङ्कूंस्तान् संक्षुद्य संनह्य भ्रष्ट्रेऽभ्यस्यति ॥२१॥
अशिशिषोः क्षीरौदनादीनि त्रीणि ॥२२॥ गर्तेध्मा-
वन्तरेणावलेशनीं स्थाणौ निबध्य द्वादशरात्रं सम्पातान-
भ्यतिनिनयति ॥२३॥ षष्ठ्योदवज्रान्प्रहरति ॥२४॥
सप्तम्याचामति ॥२५॥ यश्च गामित्यन्वाह ॥२६॥ निर्दु-
र्मण्य इति संधाव्याभिमृशति ॥२७॥३॥४९॥
इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे षष्ठोऽध्यायः समाप्तः ॥६॥
स्वस्तिदा ये ते पन्थान इत्यध्वानं दक्षिणेन प्रका-
दन को लाकर अभिमंत्रण करके शत्रु के लिये देवे ॥ शत्रु की मूर्त्ति मट्टी
की बनाकर वेदि के मध्य में ऊँचे स्थाणु में बाँध देवे और उसके शिर
पर घी के सम्पातों को चुलावे ॥ “यस्मिन् षडुर्वीः पञ्च”० से उदवज्रों
से उक्त विधान से शत्रु के शिर पर मारे ॥ “योऽन्नादोऽन्नपतिः०” ऋचा
से शत्रु को मन से आचमन करे तो स्वयं शत्रु का मरण हो जावेगा ।
“यश्च गां पदा स्फुरति ऋग्द्वयाधिकारः” तीन ऋ० से शत्रु को देखकर
पढ़े ॥ अवभृथ में स्नान कर “निर्दुर्मण्य०” से सर्वौषधियों से अपने
को अभिमर्शन करे ॥ अभिचार करके इस शान्ति को कर्त्ता करे ॥
अभिचार पद्धति समाप्त हुई ॥ इस प्रयोग से मरण, बन्धन या बेहोश
गिर जाना, पागल होना, होता है ।६।७।८।९।१०।११।१२।१३।१४।१५।१६
।१७।१८।१९।२०।२१।२२।२३।२४।२५।२६।२७॥३॥४९॥ यह उनचासवी
कण्डिका समाप्त हुई ॥४९॥ और अथर्ववेद के कौशिक सूत्र के छठा
अध्याय का भाषानुवाद भी समाप्त हुआ ॥६॥
अब स्वस्त्ययन कर्म को कहते हैं । व्याघ्र, चोर, हुराल, चरक, सिंह
आदि बनैले हिंसक जन्तुओं का मार्ग में चलते समय भय हो तो “स्व-
स्तिदा ये ते०” इत्यादि मंत्रों को मार्ग में जाने के पहिले दहिना पग
आगे कर चले और गौ को आगे कर स्वयं उसके पीछे-पीछे चले । मार्ग
में कीलक गाड़ता उखाड़ता हुआ घर से जंगल को जावे ॥१॥ जल भरे