कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
हननिवेष्टनानि सर्वाणि खलु शश्वद्धूतानि ॥ ११ ॥
ब्राह्मणाद्वज्रमुद्यच्छमानाच्छङ्कन्ते मां हनिष्यसि मां हनि-
ष्यसीति तेभ्योऽभयं वदेच्छमग्नये शं पृथिव्यै शमन्त-
रिक्षाय शं वायवे शं दिवे शं सूर्याय शं चन्द्राय शं
नक्षत्रेभ्यः शं गन्धर्वाप्सरोभ्यः शं सर्पेतरजनेभ्यः शिवं
मह्यमिति ॥१२॥ यो व आपोऽपां यं वयमपामस्मै वज्र-
मित्यन्वृचमुदद्वज्रान् ॥१३॥ विष्णोः क्रमोऽसीति
विष्णुक्रमान् ॥१४॥ ममाग्ने वर्च इति बृहस्पतिशिरसं
पृषातकेनोपसिच्याभिमन्त्र्योपनिदधाति ॥१५॥ प्रति-
जानन्नानुव्याहरेत् ॥१६॥ उत्तमेनोपद्रष्टारम् ॥१७॥
उदेहि वाजिनित्यर्धर्चेन नावं मज्जतीम् ॥१८॥ समिद्धो-
ऋचाओं से दो करना आधे को घड़े में करके आधे को भाजन में धर
के भाजन को अग्नि पर तपावे और घड़े को अन्य पुरुष को देकर
“अग्नेर्भाग०” आठ ऋ० से तपावे । बाहर दक्षिणाभिमुख होकर बैठ
भाजन को आगे करके “वातस्य रंहितस्य०” मंत्र से जल को लेकर
“समग्नय०” कल्पज सूक्त से सब भूतों के लिये अभय कहना । और
“यो व आपोऽपां०” से वज्र को फेके “अनाधराच पराच” इस कल्पज
ऋचा से भाजन, उदक को भूमि पर लावे ॥ “यं वयं०” इस सूक्त ही
से “अपामस्मै वज्रं०” इस एक ऋ० से ऐसा ही करे । “इन्द्रस्यौज०”
इत्यादि करे ॥ “विष्णोः क्रमोऽसि” १२ ऋचाओं में से प्रत्येक ऋचा से
विष्णु क्रमों को शत्रु के सम्मुख करे । सब विधान से बृहस्पति शिर
ओदन को शत्रु के लिये देवे ॥ “ममाग्ने वर्च'० इस सूक्त से उस को
पृषातक से सिंचन करके “तस्यौदनस्य०” इस अर्ध सूक्त से अभि-
मंत्रण करके देवे । सूक्त से अभिस्रुत करने पर सूक्त से सम्पातवन्त
करे ॥ “उदेहि नावं” शत्रुओं को कहे । शङ्कुसहित पाशों को अभिमंत्रण
करके वन में डाल देवे । शत्रु के पदचिन्ह को छेदन करे । पाशों
को भाष्ट्र में डाले। कच्चे पात्र पर शत्रु के हाथ प्रक्षालन करे ॥
वृषभको लाकर शत्रु के घरों की ओर उसे छोड़े॥ लाल शालि के क्षीरौ