कौषीतकि ब्राह्मण (शाङ्खायन ब्राह्मण - उदय प्रणीत व्याख्या सहित सटीक)
Kaushitaki Shankhayana Brahmana with Udaya Commentary
महर्षि कौषीतकि (टीकाकार: उदयसूरि) द्वारा
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अनाधृष्टा चानाधृष्या च XXVII. 9.१४. (AB. 5.25.19.) अमुष्यै स्वाहामुष्यै स्वाहा IV. 10.७. (ŚG. 1.9.18.)
अनाप्ता चानाप्या च XXVII. 9.११. (AB. 5.25.18.) अम्बयो यन्त्यध्वभिः XII. 2.१८. RV. 1.23.16.
अनिलया चापभया च XXVII. 9.६. (AB. 5.25.17.) अयं वेनश्चोदयत् पृश्निगर्भाः VIII. 6.१७. RV. 10.123.1.
अनुत्तमा ते मघवन् नकिर्नु XIX. 6.२. RV. 1.165.9. अयं सोम इन्द्र तुभ्यं सुन्वे XXVI. 7.१९. RV. 7.29.1.
अन्तश्च प्रागा अदितिर्र्भवासि IX. 6.१०. RV. 8.48.2. अयं ह येन वा इदम् XXIII. 4.३३. RV. 8.76.4.
अन्नादी चान्नापत्नी च XXVII. 9.१. (AB. 5.25.15.) अयं जायत मनुषो घरीमणि XXIII. 9.७. RV. 1.128.1.
अप चक्रा अवृत्सत IX. 4.१५. (ŚŚ. 5.13.13.) अयं देवाय जन्मने XXVI. 6.६. RV. 1.20.1.
अप ध्वान्तमूर्णोहि पूर्धि चक्षुः XXV. 3.६. RV. 10.73.11. अया वाजं देवहितं सनेम XI. 6.१७. RV. 6.17.15.
अप प्राच इन्द्र विश्वां अमित्रान् XXIX. 4.१३. RV. 10.131.1. अरूरुचदुषसः पृश्निरग्रियः VIII. 7.२२. RV. 9.83.3.
अपश्य त्वा मनसा चेकितानम् VIII. 6.१०. RV. 10.183.1. अर्चन्तस्तवा हवामहे XXVI. 6.२२. RV. 5.13.1.
अप स्वसुरुषसो नग् जिहीते XXVI. 7.१७. RV. 7.71.1. अर्वाङ् रथं विश्ववारं त उम्र XXIV. 7.५. RV. 6.37.1.
अपाः पूर्वेषां हरिवः सुतानाम् XVII. 3.३२. RV. 10.96.13. अर्हन् बिभर्षि सायकानि धन्वा VIII. 6.३. RV. 2.33.10.
अपादित् उदु नश्चित्रतमः XXIV. 7.६. RV. 6.38.1. अव स्य शूराध्वनो नान्ते XXVI. 13.२१. RV. 4.16.2.
अपानं मे पाह्यपानं मे जिन्व स्वाहा त्वा सुभव सूर्याय XII. 5.६. (ŚŚ. 6.8.2.) अवा नो मघवन् वाजसातौ XXIII. 6.२३. RV. 6.15.15.
अपां नपातमवसे XXVI. 9.२. RV. 1.22.6. अवासयञ्छुभसं सूर्येण XXV. 2.२. RV. 7.91.1.
अपामुपस्थे महिषा अगृभ्णत XXI. 3.२७. RV. 6.8.4. अवितासि सुन्वतो वृक्तबर्हिषः XXIII. 4.२३. RV. 8.36.1.
अपूर्वा चाभ्रातृव्या च XXVII. 9.१७. (AB. 5.25.20.) अश्वीं अग्ने रथीरिव XXII. 5.१३. RV. 8.75.1.
अपूर्व्या पुरूतमान्यस्मै XXVI. 8.१६. RV. 6.32.1. अश्वामघा गोमघा वां हुवेम XXVI. 7.१८. RV. 7.71.1.
अपेतोजन्यं भयमन्यजन्यं च वृत्रहन् IX. 4.१४. (ŚŚ. 5.13.3.) अश्विना यज्वरीरिषः XIV. 6.१८. RV. 1.3.1.
अप्रायुवो रक्षितारो दिवेदिवे XX. 6.१३. RV. 1.89.1. अश्विना वायुना युवँ सुदक्षा XVIII. 4.२७. RV. 3.58.7.
अबुध्रम् त्य इन्द्रवन्तो अग्रयः XXI. 5.१३. RV. 10.35.1. अस्तं यं यन्ति धेनवः XXIII. 4.१५. RV. 5.6.1.
अभि तष्टेव दीधया मनीषाम् XXIX. 7.४. RV. 3.38.1. अस्तम्नाद् द्यामसुरो विश्ववेदाः IX. 6.११. RV. 8.42.1.
अभि त्यं देवं सवितारमोण्योः कविक्रतुम् XXIII. 11.१. AV. 7.14.1. अस्युरत्र धेनवः पिन्वमानाः XXVI. 10.१०. RV. 3.1.7.
XXVII. 4.१०. TS. 1.2.6.1. अस्माअस्मा इदन्धसः XXIII. 5.२५. RV. 6.42.4.
VS. 4.25. अस्मा इदु प्र तवसे तुराय XXVI. 13.२६. RV. 1.61.1.
अभि त्यं मेषं पुरुहूतमुग्मियम् XXV. 5.२०. RV. 1.51.1. अस्मासु नृम्णं धाः XXVII. 7.१७. (ŚŚ. 10.14.6.)
XXVI. 5.२१. RV. 1.51.1. अहन्नहिमन्यपस्ततर्द XX. 5.३३. RV. 1.32.1.
अभि त्वा देव सवितः VIII. 1.१०. RV. 1.24.3. अहं भुवँ वसुनः पूर्व्यस्पतिः XXII. 5.३६. RV. 10.48.1.
XXII. 6.१. RV. 1.24.3. XXVI. 13.३६. RV. 10.48.1.
XXVI. 14.१. RV. 1.24.3. अहश्च कृष्णमहरर्जुनं च XXIII. 11.३२. RV. 6. 9.1.
अभुदुषा रुशत्पशुः XI. 6.११. RV. 5.75.9. अहोरात्राणि विदधदूर्णाका इव धीर्यंः XIX. 2.१९.
अभूद् देवः सविता वन्द्यो नु नः XX. 4.१. RV. 4.54.1. आगन् देव ऋतृभिर्वर्धतु क्षयम् VII. 12.३२. RV. 4.53.7.
अमूरेको रयिपते रयीणाम् XXIII. 5.३३. RV. 6.31.1. आगुर उद्दचम् VII. 3.१४. (ŚŚ. 5.3.7.)
XXV. 7.३१. RV. 6.31.1. आ गोमता नासत्या रथेन XXV. 2.९. RV.7.72.1.