कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदशम लम्बक ८५१
यह सुनकर चिरंजीवी काकराज से बोला— इस सारी शत्रुता का मूल कारण वाणी
का दोष है। क्या तुमने गध की कथा नहीं सुनी ? ॥१८॥
किसी धोबी ने अपने दुर्बल गधे को पुष्ट करने के लिए बाघ के चमड़े से ढककर दूसरे
के खेत में छोड़ दिया ॥१९॥
वह खेतों में फसलों को खाता था किन्तु 'यह बाघ है, इस भय से खेत के रखवाले उसे
रोक नहीं सकते थे। कुछ समय बाद एक धनुर्धारी किसान ने उसे देखा ॥२०॥
वह भय से नम्र और कुबड़ा होकर शरीर को कम्बल से लपेटकर उधर से जाने
लगा ॥२१॥
काला कम्बल ओढ़कर और कुबड़ा होकर जाते हुए उसे देखकर गधे ने उसे दूसरा
गधा समझा और फसल खाये हुए गधे ने मस्ती में अपनी ढिंचूँ-पों आवाज लगाकर उसे
बुलाना शुरू किया ॥२२॥
उसकी आवाज सुनने से उस किसान ने अपनी ही आवाज से अपना नाश करनेवाला
गधा समझकर उसे बाण से मार डाला ॥२३॥
इसी प्रकार, वाणी-दोष के कारण ही हमारी उल्लुओं से शत्रुता है। पहले किसी समय
पक्षी राजा से हीन थे ॥२४॥
उन्होंने एकत्र होकर पक्षिराज का अभिषेक प्रारम्भ किया और सभी ने छत्र चामर लगे
उल्लू को राजा बनाने की तैयारी की। इतने में ही आकाश से आये हुए कौए ने यह देखकर कहा—
'अरे मूर्खो ! क्या हंस कोयल आदि और पक्षी नहीं हैं कि इस क्रूर, पक्षी अमंगल और देखने में
भद्दे उल्लू को राजा बना रहे हो ? धिक्कार है ॥२५-२७॥
किसी प्रभावशाली व्यक्ति को राजा बनाना चाहिए, जिसका नाम ही सिद्धिदायक हो।
इस विषय में एक कथा सुनो। मैं तुम लोगों से कहता हूँ ॥२८॥
चतुर्दन्त नाम के हाथी और खरगोशों की कथा¹
कहीं पर अथाह पानी से भरा चन्द्रसर नाम का एक तालाब था। उसके किनारे शिलीमुख
नाम का खरहा का राजा रहता था ॥२९॥
उस वन में अनावृष्टि के कारण अन्य सभी जलाशयों के सूखने पर हाथियों के झुंड
का एक चतुर्दन्त नामक सरदार किसी समय पानी पीने के लिए वहाँ आया ॥३०॥
१ पंचतन्त्र में इस कथा का प्रारम्भ इस प्रकार है—
व्यपदेशेन महतां सिद्धि संञ्जायते परा।
शशिनो व्यपदेशेन वसन्ति शशकाः सुखम्॥