कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
पृष्ठ 864, कुल 1079 में से
संदर्भ में पढ़ेंदशम लम्बक ८१५
उनके पास आकर सब वृत्तान्त पूछकर उस सहृदय चूहे ने चित्रग्रीव और उसके साथियों
के जाल काट दिये ॥७० ॥
जाल कट जाने पर, अपने स्नेहपूर्ण मीठे शब्दों से चित्रग्रीव ने उस चूहे को धन्यवाद दिया
और अपने अनुचरों के साथ आकाश में उड़ गया ॥७१॥
जाल में फंसे कबूतरों के पीछे आया हुआ लघुपती नाम का कौआ यह सब देख
रहा था। वह बिल में गये हुए चूहे के पास आकर कहने लगा—'मैं लघुपती नाम का कौआ हूँ।
तुम्हें मित्रस्नेही देखकर, विपत्ति से मित्रों का उद्धार करनेवाले तुमसे मित्रता करना
चाहता हूँ ॥७२-७३॥
यह सुनकर बिल के अन्दर से ही कौए को देखकर चूहा बोला—'जा। तू मेरा
भक्षक है और मैं तेरा भक्ष्य हूँ। मेरी-तेरी मित्रता कैसी? ॥७४॥
तब वह कौआ बोला—'ऐसा न कहो। तुम्हें खा लेने पर तो क्षण भर की तृप्ति होगी
और तुम्हारी मित्रता में सदा के लिए रक्षा होगी ॥७५॥
इस प्रकार की बातें कहकर और शपथपूर्वक विश्वास दिलाकर कहा गया वह चूहा बिल
से बाहर निकला और उस कौए ने उसके साथ मित्रता कर ली ॥७६॥
तब वह चूहा उसके लिए मांस के टुकड़े लाया और चावल के दाने भी। तब दोनों ने
मिलकर वही भोजन किया और सुखपूर्वक बैठकर वार्तालाप किया ॥७७॥
एक बार वह कौआ मित्र चूहे से बोला—'मित्र, यहाँ समीप ही वन के मध्य में एक नदी है।
उस नदी में मेरा मित्र मन्थर नाम का कछुआ है। उसके लिए मैं वहाँ जा रहा हूँ। वहाँ
मेरे लिए आमिष-भोजन सुलभ है ॥७८-७९॥
यहाँ रहने से मांस का आहार पाकर भी मुझे बहेलियों का भय सदा ही बना
रहता है। ऐसा कहते हुए कौए से चूहा बोला ॥८० ॥
'यदि ऐसा है, तो हम लोग साथ ही रहेंगे। मुझे भी यहाँ से कुछ वैराग्य हो गया है।
इसका कारण वहीं चलकर कहूँगा ॥८१॥
वह लघुपती कौआ इस प्रकार कहते हुए हिरण्यक को अपनी चोंच में लेकर आकाश
में उड़ गया और उसे उस वन-नदी के तीर पर ले गया ॥८२॥
वहाँ अपने मित्र मन्थर से मिलकर, और उसका आतिथ्य स्वीकार करके चूहे
के साथ वह वहीं रहने लगा ॥८३॥
बातचीत के प्रसंग में कौए ने अपने आने का कारण उसे बताया और हिरण्यक चूहे
की मित्रता के कारण भी उस कछुए से कहा ॥८४॥