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सर्वकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

Kathasaritsagara Part 2 (Lambaka 6–18)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

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पृष्ठ 424

अष्टम लम्बक ३८९
यह रंगमंच का नाचना नहीं है कि पुरुष के लिए लज्जा का विषय हो। यह तो एक गुप्त
मित्र-मंडली है, इसमें केवल अपनी विद्वत्ता का प्रदर्शन मात्र करना है।।१४।।
मैं तुम्हारा राजा नहीं हूँ मित्र हूँ। आज मैं तुम्हारा नृत्य देखे बिना भोजन ग्रहण न
करूँगा।।१५।।
राजा के इस प्रकार आग्रह करने पर गुणशर्मा ने नाचना स्वीकार किया। हठी राजा की
आज्ञा का उल्लंघन उसके अनुजीवी कैसे कर सकते हैं।।१६।।
तदनन्तर, उस युवा गुणशर्मा ने इतना सुन्दर आंगिक नृत्य किया कि उसे देखकर राजा
और रानी दोनों का चित्त नाचने लगा ।।१७।।
नृत्य कर लेने के पश्चात् राजा ने उसे बजाने के लिए वीणा दी। उस पर झंकार देते ही
उसने कहा-महाराज दूसरी वीणा दीजिए, यह वीणा अच्छी नहीं है। इस वीणा के भीतर
कहीं कुत्ते का बाल है।।१८-१९।।
तार के झंनकार से ही मैंने यह जान लिया है। इतना कहकर गुणशर्मा ने गोद से वीणा
उतार दी ।।२० ।।
जब राजा ने उस वीणा की खूंटी को उमेठकर देखा तब उसमें सचमुच कुत्ते का बाल
उसे मिला ।।२१।।
तब राजा महासेन ने अत्यन्त आश्चर्य से उसकी सर्वज्ञता की प्रशंसा करते हुए दूसरी वीणा
मँगवाई ।।२२।।
तब गुणशर्मा ने गंगा के प्रवाह के समान सुन्दर, तीन मागों से चलनेवाली और कानों को
पवित्र करनेवाली उस वीणा को बजाकर राजा को चकित कर दिया ।।२३।।
तब गुणशर्मा ने चकित होते हुए रानी के साथ राजा को क्रमशः शस्त्रास्त्र-विद्या भी
दिखलाई ।।२४।।
तब राजा ने कहा- 'यदि तू युद्ध-विद्या जानता है, तो बिना शस्त्र हाथ में लिये ही मुझ
शस्त्रधारी को पराजित कर ।।२५।।
तब गुणशर्मा ब्राह्मण ने कहा- महाराज आप शस्त्र लेकर मुझ पर प्रहार कीजिए। मैं
आपको अपना कौशल दिखाता हूँ ।।२६।।
तदनन्तर, राजा ने तलवार आदि शस्त्रों से उस पर प्रहार करना प्रारम्भ किया। राजा
जिस-जिस शस्त्र का उस पर प्रहार करता था गुणशर्मा खेल के समान अपनी मुक्ति से उसे
छीन लेता था ।।२७।।
इस प्रकार, राजा के हाथ से शस्त्र छीनकर स्वयं अक्षत रहते हुए गुणशर्मा ने राजा के
हाथी को और राजा को बाँध दिया ।।२८।।