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सर्वकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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सप्तम लम्बक २६
यह सुनकर महावीर राजा प्रणाम करता हुआ बोला—मेरे लिए दूसरा और वर क्या
चाहिए, पहले उस ब्राह्मण का मनोरथ पूर्ण करो ॥७१॥
राजा की बात सुनकर अत्यन्त प्रसन्न अग्नि ने कहा कि यह ब्राह्मण महाधनपति होगा
और मेरी कृपा से तुम्हारा भण्डार और लक्ष्मी दोनों कभी क्षीण न होंगे। इस प्रकार, वर देते
हुए अग्नि से ब्राह्मण बोला—॥७२-७३॥
भगवन् ! स्वेच्छाविहारी राजा से तुम इतना शीघ्र प्रसन्न हो गये और कठोर नियम
तथा व्रत करनेवाले मुझसे न हुए, यह क्या बात है ? ॥७४॥
तब अग्नि ने कहा— 'यदि मैं वचन न देता तो यह महासत्त्वशाली राजा अपना
सिर काटकर मुझ में होम देता ॥७५॥
उत्कृष्ट सत्त्ववाले व्यक्तियों को सिद्धियाँ शीघ्र प्राप्त होती हैं और हे ब्राह्मण ! तुम्हारे
ऐसे मन्द सत्त्ववालों को सिद्धियाँ देर से प्राप्त होती हैं ॥७६॥
ऐसा कहकर अग्निदेव के अन्तर्धान होने पर नागशर्मा राजा से आज्ञा लेकर चला गया
और वह क्रमशः महाधनी हो गया ॥७७॥
राजा भी अपनी अद्भुत सत्त्वधीरता के कारण सेवकों से स्तुति किया जाता हुआ
पाटलिपुत्र नगर को गया ॥७८॥
एक बार एकान्त में बैठे हुए राजा के समीप समुद्भव नामक द्वारपाल ने कहा—'महाराज !
अपना नाम दत्तशर्मा बताता हुआ एक ब्रह्मचारी ब्राह्मण आपसे एकान्त में कुछ निवेदन करने
के लिए द्वार पर आया है' ॥७९-८० ॥
'उसे बुलाओ'—राजा की इस प्रकार आज्ञा पाने पर द्वारपाल उसे ले आया। वह भी
राजा को 'स्वस्ति' कहकर और प्रणाम करके बैठ गया ॥८१॥
और बोला— महाराज ! मैं किसी चूर्ण मिलाने की युक्ति द्वारा ताँबे से तुरन्त उत्तम
सोना बनाना जानता हूँ ॥८२॥
वह युक्ति गुरु ने मुझे बताई है और मैंने उसकी अनेक बार परीक्षा की है, जिससे
सोना बन गया ॥८३॥
उस ब्रह्मचारी के ऐसा कहने पर राजा ने ताँबा मँगवाया। उसके पिघल जाने पर
ब्रह्मचारी ने उसमें चूर्ण डाला। उसमें चूर्ण डालते ही किसी छिपे हुए देवता ने अदृश्य रूप से
उस चूर्ण का अपहरण कर लिया। अग्नि की कृपा से राजा ने उस अदृश्य यक्ष को देख
लिया ॥८४-८५॥