कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदशम लम्बक २०१
यदि तू एक रात मेरे साथ रहे तो एक सौ घोड़े और पाँच हजार कपड़े बिना
मूल्य भेंट कर दूँगा ॥८१॥
ऐसा कहकर उसे सकुचाती देखकर उसने और अधिक भी देने का आश्वासन दिया।
क्योंकि स्वतन्त्र स्त्री की चेष्टा की ओर किसका आकर्षण नहीं होता ॥८२॥
तब वह सुन्दरी उससे बोली कि 'मैं अपने पति से पूछती हूँ। मैं समझती हूँ
कि वह अत्यन्त लोभ के कारण यह मुझे इस कार्य के लिए भी प्रेरणा और प्रोत्साहन प्रदान
करेगा' । ॥८३॥
ऐसा कहकर और अपने घर जाकर उसने अपने पति से वह सारा वृत्तान्त कह सुनाया
जो सुखधन नामक बनिया ने उससे एकान्त में कहा था ॥८४॥
यह सुनकर अर्थलोभी पिशाच बोला—'प्रिये ! यदि एक रात में पाँच हजार वस्त्र
और पाँच सौ चीनी घोड़े मिलते हैं, तो क्या दोष है ? तू उसके पास जा और सबेरे जल्दी ही
आ जाना ॥८५-८६॥
अर्थपिशाच पुरुष पति के वचन सुनकर मानपरा सन्देह-मग्न होकर सोचने लगी—
'स्त्री को बेचनेवाले इस पापी नीच पति को धिक्कार है, जो लोभ की भावना से तन्मय
हो गया ॥८७-८८॥
इससे तो वही मेरा समुचित पति है, जो पाँच सौ घोड़ों और पाँच हजार वस्त्र के जोड़ों
से मुझे एक रात के लिए खरीद रहा है। इस कारण मेरा वास्तविक पति वही ठीक है'—ऐसा
सोचकर और नीच पति की आज्ञा लेकर वह सुखधन के पास चली गई ॥८९ १ ॥
सुखधन भी उसे आई हुई देखकर और पूछकर चकित हुआ और उसके आगमन से
उसने अपने-आप को धन्य माना ॥९१॥
सुखधन ने उसके आगमन से प्रसन्न होकर उसके पति के पास तुरन्त उस रमणी क
शुल्क के रूप में बहुत-से घोड़े और वस्त्र भेज दिये जो देने के लिए कहे थे ॥९२॥
और, सारी रात सुख से उस स्त्री के साथ रहा मानों वह सुन्दरी उसकी सम्पत्ति के
फल-रूप में मिली थी ॥९३॥
प्रातःकाल ही उस नपुंसक अर्थलोभ से उसे बुलाने के लिए भेजे गये नौकरों से
मानपरा ने कहा—॥९४॥
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