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सर्वकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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सप्तम लम्बक ९१
वह दरिद्र और गुणी चतुर्वेदी ब्राह्मण दान लेने के लिए द्वारपालों से निवेदन किये जाने
पर उसके समीप गया ॥१२॥
उस मदनमाला ने व्रत से कृश और विरह से पीले पड़ गये अंगोंस उस ब्राह्मण की
विधिवत् पूजा करके सोने की चार भुजाएँ उसे प्रदान कीं ॥१३॥
उस ब्राह्मणने उसके दुःखी परिवार से उसकी कष्ट-कथा और अन्त में अग्नि-प्रवेश की
प्रतिज्ञा सुनकर मन में खेद प्राप्त किया ॥१४॥
विप्र और साथ ही ब्राह्मण सोने की भुजाओं को दो ऊँटों पर लादकर अपने घर
पाटलिपुत्र को चला गया ॥१५॥
घर पहुँचकर उसने सोचा कि यदि यह सोना राजा द्वारा रक्षित न किया गया तो मेरा
कल्याण नहीं है—ऐसा सोचकर वह ब्राह्मण दरबार में बैठे हुए राजा विक्रमादित्य के पास गया और
निवेदन करने लगा— महाराज ! मैं इसी नगर का रहनेवाला ब्राह्मण हूँ। मैं दरिद्र धन के लिए
दक्षिण दिशा के महाराज नरसिंह के प्रतिष्ठान नगर में गया था। वहाँ दाताओ में प्रसिद्ध
यशस्विनी मदनमाला के घर गया था। उसके पास एक दिव्य पुरुष कुछ दिनों तक रहकर और उस
सोने के पाँच अवयव देकर कहीं चला गया। उसके वियोग से पीड़ित मदनमाला जीवन को
विडम्बना, देह को निष्फल और आहार को विष रातको शयनकर जीवित है। उसने सबकों के
आश्वासन देने पर यह प्रतिज्ञा की है कि यदि वह मेरा प्यारा पति छह महीने के अन्दर आकर
मुझे नहीं सँभालेगा तो मैं अभागिन आग में प्रवेश करूँगी ॥१६-११३॥
इस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध मदनमाला मरण के लिए उद्यत होकर अत्यधिक पुण्य-लाभ की
इच्छा से प्रतिदिन बहुत दान देती है। ॥११४॥
महाराज ! मैंने उसे देखा है। उसने वैधव्यव्रत लिया है किन्तु अनाहार से दुर्बल होने पर
भी उसका शरीर अति मनोहर है। दान के जल से उसके हाथ सदा भीगे रहते हैं। प
रूप सौन्दर्य उसके रूप अनुकूल रहता है। वह कामरूपी हाथी की शरीरव्यापिनी मनोरचना
के समान प्रतीत होती है ॥११५-११६॥