कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
पृष्ठ 712, कुल 876 में से
संदर्भ में पढ़ेंवह राजकुमारी कलिङ्गसेना इस प्रकार की विविध बातें सोचती-सोचती कठिनाई से
रात व्यतीत कर सकी। उधर सोमप्रभा ने भी राजकुमारी के पुनर्सङ्गम की लालसा में उत्कण्ठित
रहकर रात बिताई॥१९३॥
मदनमंचुका लम्बक का दूसरा तरंग समाप्त
तीसरा तरंग
कलिङ्गसेना का वृत्तान्त क्रमशः
तदनन्तर प्रातः काल होते ही सोमप्रभा ने सखी के मनोविनोद के लिए एक डोलची में
सरकी की पुतलियों तथा विविध प्रकार के यन्त्रमय खिलौनों को सजाया और उसे साथ लेकर
आकाश में विहार करती हुई वह राजकुमारी कलिङ्गसेना के घर पर पहुँची ॥१-२॥
कलिङ्गसेना भी उसे आती हुई देखकर आनन्द के आँसुओं से भरी हुई उठकर उसके
पास गई और उसे गले लगाकर पास में बैठाकर कहने लगी—'हे सखि ! तुम्हारे मुख-रूपी
पूर्ण चन्द्रमा के दर्शन के बिना आज की मेरी सारी त्रियामा (तीन प्रहरोंवाली रात) शतयामा
(सौ प्रहरोंवाली रात) के समान व्यतीत हुई ॥३-४॥
न जाने तुम्हारे साथ मेरा पूर्वजन्म का कौन-सा सम्बन्ध है जिसका कि यह परिणाम है।
हे देवि यदि जानती हो तो कहो' ॥५॥
यह सुनकर सोमप्रभा उस राजपुत्री से इस प्रकार कहने लगी—'मुझे इसका ज्ञान नहीं
है। मैं पूर्वजन्म को स्मरण करनेवाली नहीं हूँ ॥६॥
इस विषय को मुनि लोग भी नहीं जानते जो जानते भी हैं तो उन्होंने पूर्वजन्म में ऐसा
ही पुण्य किया होता है कि जिससे वे दूसरों के पूर्वजन्म की बात जानते हैं ॥७॥
इस प्रकार प्रेम और विश्वास से सोमप्रभा को मधुर कहती हुई कलिङ्गसेना ने एकान्त में
कौतुक के साथ पूछा ॥८॥
'हे गुणरूप हे सखि यह तो बता कि सुन्दर चरित्रवाली तूने अपने जन्म से किस देवआदि
के वंश को मोती के समान धन्य किया है। संसार के कानों के लिए सुनने में अमृत के समान तेरा
नाम क्या है? इस बाँस की डोलची को क्यों लाई है और इनमें क्या वस्तु है ॥९-१०॥
८३