कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
पृष्ठ 662, कुल 876 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठ लम्बक ६१
उभरे हुए स्तनरूपी तटोंवाली एवं लावण्य-जल से भरपूर रमणी-नदी में बहाया हुआ
कौन व्यक्ति अपने नियन्त्रण में रह सकता है? ॥६५॥
क्या पूर्व समय में तिलोत्तमा को देखकर शिवजी क्षुब्ध नहीं हो गये थे, जिसे विधाता ने
सभी सुन्दर वस्तुओं से एक रत्न एकत्र करके निर्मित किया था? ॥६६॥
क्या मेनका को देखकर विश्वामित्र ने तप करना नहीं छोड़ दिया था ? क्या शर्मिष्ठा
के रूप के लोभ से ययाति ने बुढ़ावस्था नहीं प्राप्त की थी ? ॥६७॥
इसलिए यहाँ इस विषय में यह विद्याधर-युवक अपराधी नहीं है; क्योंकि अप्सरा ने
अपने तीनों लोकों को वश में करनेवाले रूप से इसे मोहित कर लिया ॥६८॥
हीन जाति में उत्पन्न यह स्वर्गीया रमणी पापिनी है, जिसने देवताओं का त्याग कर
इस नन्दन वन में प्रविष्ट किया ॥६९॥
ऐसा सोचने के पश्चात् विद्याधर युवक को छोड़कर अहल्या के प्रेमी' (जार) इन्द्र ने
उस अप्सरा को शाप दिया—॥७०॥
'पापिन् ! तू मानुष्य योनि में जाकर, उसमें अयोनिशा कन्या को प्राप्त करके फिर
तपस्या करने के पश्चात् फिर स्वर्ग में आवेगी ॥७१॥
इसी समय तक्षशिला के राजा कलिङ्गदत्त की रानी तारादत्ता ऋतुमती हुई। उसी रानी
के गर्भ में इन्द्र के शाप से पतित सुवर्णप्रभा स्वर्गीया ने प्रवेश और निवास किया ॥७२-७३॥
उस समय रानी तारादत्ता ने स्वप्न में देखा कि आकाश से एक ज्वाला उसके पेट में
प्रवेश कर रही है ॥७४॥
प्रातःकाल रानी ने आदर के साथ पति को स्वप्न की घटना सुनाई। सुनने पर राजा ने
प्रसन्न होकर कहा ॥७५॥
'देवि, चिरञ्जीवि-ऋषियों द्वारा दिया गया वरदान निष्फल नहीं होता है। इसीलिए मैं समझता हूँ
कि कोई देवजातीय प्राणी तुम्हारे गर्भ में आया है ॥७६॥
इस नौवें महीने के पेट में रहने और बड़े विचित्र-विचित्र प्रकार से रानी अपने रूपों को बदलने
लगी और अद्भुत रूप प्राप्त करने के लिए वह उद्यत हुई ॥७७॥
१. अहल्या के प्रेमी—यह विशेषण इन्द्र के लिए आया है।
५३