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सर्वकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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पंचम लम्बक ५६९
उसे देखकर वह बीच की मंजिल से उतरकर कौतुक के साथ उस घोड़े के समीप
आया ॥८५॥
वहाँ एकान्त देखकर उसने घोड़े पर चढ़ने की इच्छा प्रकट की। ज्यों ही उसने उस पर
चढ़ने का प्रयत्न किया त्यों ही घोड़े ने लात मारकर उसे पासवाली बावली में गिरा दिया।
बावली में गिरा हुआ वह शक्तिदेव अकस्मात् ही वर्धमान नगर-स्थित अपने घर के उद्यान की बावली
में आ निकला ॥८६-८७॥
और उसने बावली के जल में खड़े हुए अपने को चन्द्रप्रभा के बिना मुरझाए हुए कुमुद
के समान अपनी जन्मभूमि में पाया ॥८८॥
शक्तिदेव का पुनः वर्धमाननगर में आगमन
वह सोचने लगा कहाँ यह वर्धमान नगर और कहाँ वह विद्याधरों की कनकपुरी नगरी!
यह क्या आश्चर्य है। क्या मायाजाल है? दुःख है कि किसी ने मुझ अभागे को ठग लिया है।
या यह कौन जानता है कि आगे क्या होनेवाला है॥८९-९०॥
इन सब बातों को सोचता हुआ वह चकित शक्तिदेव बावली से निकला और अपने पिता
के घर गया ॥९१॥
वहाँ पर वह राजा की घोषणा के अनुसार कनकपुरी का भ्रमण-वृत्तान्त किसी को न
बताकर, और इधर-उधर की झूठी बातें बनाकर पिता द्वारा प्यार किया गया वह शक्तिदेव उसके
आने की प्रसन्नता मनाते हुए घर के व्यक्तियों के साथ घर में ही रह गया ॥९२॥
दूसरे दिन घर से बाहर निकलकर उसने उसी ढिंढोरे को फिर से सुना जो उस नगर में
पीटा जा रहा था ॥९३॥
'कोई ब्राह्मण या क्षत्रिय-युवक जिसने कनकपुरी देखी हो वह कहे और राजकन्या तथा
युवराज-पद प्राप्त करे' ॥९४॥
यह सुनकर वह सफल शक्तिदेव ढिंढोरा पीटनेवालों के पास गया और बोला— मैंने वह
नगरी देखी है' ॥९५॥
उन लोगों ने उसे शीघ्रता से राजा के पास ले जाकर खड़ा कर दिया और राजा ने भी उसे
पहचानकर पहले के समान झूठ बोलनेवाला समझा ॥९६॥
तब वह शक्तिदेव कहने लगा—'यदि मैं झूठ बोल रहा हूँ कि वह नगरी मैंने नहीं देखी
है तो मुझे प्राणदंड दिया जाय ॥९७॥
'आज यह राजपुत्री मुझसे (शक्ति देव से) उस नगरी के सम्बन्ध में पूछे ऐसा कहकर
राजा ने अपने सेवकों से राजकुमारी को वहीं बुलवा लिया ॥९८॥
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