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सर्वकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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पंचम लम्बक ५१९
'वहाँ पर मेरा माननीय बड़ा भाई दीर्घतपा नाम का ऋषि है। उसके पास जाओ। वह
बहुत वृद्ध है। सम्भव है वह उस पुरी को जानता हो' ॥२४॥
यह सुनकर 'ठीक है' ऐसा कहकर और मुनि की बातों में विश्वास करके शक्तिदेव ने
वह रात वहीं व्यतीत की और प्रातःकाल ही काम्पिल्य नगरी की ओर शीघ्रता से चला गया ॥२५॥
अनेक कष्टों से सैकड़ों दुर्गम पथ पार करते हुए बहुत दिनों के पश्चात् वह काम्पिल्य नगर
में पहुँचा और उस पर्वत पर चढ़ा ॥२६॥
वहाँ जाकर उसने आश्रम में रहनेवाले दीप्ततपा मुनि को देखा और प्रणाम करके उसके
समीप गया। मुनि ने भी उसका स्वागत किया ॥२७॥
तत्पश्चात् शक्तिदेव ने राजकुमारी द्वारा बताई हुई कनकपुरी नगरी के सम्बन्ध में
निवेदन किया और कहा कि मैं उसी ओर जा रहा हूँ किन्तु ज्ञात नहीं कि वह नगरी
कहाँ है ॥२८॥
मुझे वहाँ अवश्य जाना है। उसका पता प्राप्त करने के लिए ही सूर्यतप ऋषि ने आपके
पास मुझे भेजा है ॥२९॥
इस प्रकार कहते हुए शक्तिदेव से मुनि ने कहा— बेटा ! इतनी लम्बी अवस्था में भी
मैंने आजतक इस नगरी का नाम नहीं सुना था ॥३०॥
दूर-दूर देशों से आये हुए किन-किन से मेरा परिचय नहीं हुआ किन्तु किसी से भी यह नाम
मैंने नहीं सुना दर्शन तो दूर की बात है ॥३१॥
बेटा ! मैं तो समझता हूँ कि वह दूर कहीं किसी दूसरे ही द्वीप में है। उसका उपाय तुम्हें
बताता हूँ ॥३२॥
समुद्र के मध्य में उत्स्थल नाम का एक द्वीप है वहाँ न यदत्त नाम का एक धनी निषादराज
है। उसका नाव सदा दूर-दूर के द्वीपों में आना-जाना है। इसलिए सम्भव है कि उसने वह
नगरी कहीं देखी या सुनी हो। इसलिए तुम यहाँ से पहले समुद्र के गम्भीर-स्थित विटंकपुर नामक
नगर को जाओ। वहाँ से किसी बनिये के साथ उसकी नाव में उस निषादराज के पास अपनी
इष्टसिद्धि के लिए जाओ ॥३३-३६॥
इस प्रकार उस मुनि से कहा हुआ शक्तिदेव उसी समय मुनि से आज्ञा लेकर उसके आश्रम
से चला गया ॥३७॥
क्रमानुक्रम से वह कष्टों से देशों और वनों को पार करके समुद्र-तट के भूषण उस विटंकपुर
में पहुँचा ॥३८॥