कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपंचम लम्बक ४८७
माता पिता और बन्धु (भाई) से पराधीन कन्या स्वतन्त्र नहीं रह सकती ॥४१॥
कन्या उत्पन्न होते ही दूसरे के लिए पालित पोषित और रक्षित की जाती है। बाल्या-
वस्था के अनन्तर पति के बिना पिता के घर पर कन्या का जीवन क्या है? अर्थात् कुछ
नहीं ॥४२॥
पितृगृह में कन्या के ऋतुमती होने पर उसके बन्धु-बान्धव अधोगति को प्राप्त
होते हैं। वह कन्या वृषली' हो जाती है और उसके पति को वृषलीपति कहा जाता है ॥४३॥
राजा के इस प्रकार कहने पर वह कनकरेखा अपने मन की बात राजा से
कही—॥४३॥
'पिता यदि ऐसी बात है तो जिस वीर ब्राह्मण या क्षत्रिय ने कनकपुरी नाम की नगरी
देखी हो, उसे आप मुझे दे दीजिए और वही मेरा पति होगा। अन्यथा व्यर्थ में आप मेरी
दुश्चिन्ता न करें' ॥४३४॥
कन्या के ऐसा कहने पर राजा ने सोचा भला भाग्य से इस कन्या ने विवाह करना तो
स्वीकार किया ॥४४॥
अवश्य ही किसी कारण से मेरे घर में यह कोई देवी उत्पन्न हुई है। अन्यथा यह छोटी
कन्या होकर भी यह सब कैसे जानती है ॥४५॥
उस समय ऐसा सोचकर और उसकी बात स्वीकार करके राजा उठकर चला गया और
अपने दैनिक कार्य में व्यस्त हो गया ॥४६॥
दूसरे ही दिन दरबार में बैठकर राजा ने दरबारियों से कहा—'क्या आप लोगों में से
किसी ने कनकपुरी नाम की नगरी देखी है ? ॥४७॥
जिसने देखी हो वह ब्राह्मण हो या क्षत्रिय उसे अपनी कन्या कनकरेखा और उसके
साथ युवराज-पद प्रदान करूँगा ॥४८॥
परस्पर एक दूसरे का मुख देखते हुए सभासदों ने कहा— महाराज उसे देखने की बात
कौन कहे, हमलोगों ने यह नाम तक सुना नहीं ॥४९॥
तब राजा ने प्रतिहार को यह आज्ञा दी कि— जाओ इस नगर में ढिंढोरा पीटकर घोषणा
कर दो कि किसी ने कनकपुरी देखी है या नहीं? और तुम इस बात का पता
लगाओ ॥५०॥
राजा से आज्ञा पाकर प्रतिहार 'जो आज्ञा' कहकर चला गया ॥५१॥
१ वृषली—शूद्र जाति की स्त्री—शङ्ख।