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सर्वकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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चतुर्थ लम्बक ४६७
उस पुरुष की मूर्ति भस्म के अंगराग से श्वेत थी और मस्तक पर चन्द्रमा था। उसकी
लम्बी-लम्बी और पीले रंग की जटाएँ थीं और हाथ में त्रिशूल था॥४॥
उसने मेरे पास आकर मानों दयार्द्र होकर कहा — 'बेटी! तुम्हें अपने गर्भ के सम्बन्ध
में कोई भी चिन्ता नहीं करनी चाहिए॥५॥
मैं तेरे गर्भ की रक्षा करता हूँ और मैंने ही तुझे यह गर्भ दिया है। तुम्हारे विश्वास के
लिए एक बात और बता दूँ, सुनो॥६॥
प्रातःकाल कोई एक स्त्री अपने पति को पकड़कर डाँटती-डपटती और उसे खींचती हुई
कुछ निवेदन करने के लिए तुमलोगों के पास आवेगी ॥७॥
यह स्त्री दुराचारिणी है और अपने बन्धुजन के बलपर पति को मारना चाहती है। वह
मिथ्या भाषण करती है॥८॥
यह बात सुनकर वत्सराज उदयन को पहले ही बता देना जिससे वह सज्जन पति
उस दुष्टा से छूट जाय' ॥९॥
इस प्रकार स्वप्न में आज्ञा देने पर और उनके सहसा अदृश्य हो जाने पर मैं एकाएक
जागी तो देखा कि रात भी बीत चुकी और प्रातःकाल हो गया ॥१० ॥
रानी का यह स्वप्न-समाचार सुनकर शिवजी की कृपा का वर्णन करते हुए उस स्त्री के
आने की प्रतीक्षा करते हुए सभी व्यक्ति आश्चर्यचकित हो रहे थे॥११॥
उसी क्षण प्रधान द्वारपाल ने आकर वीणा पर ध्यान वत्सराज से एकाएक निवेदन
किया—॥१२॥
महाराज ! अपने बान्धवों के साथ पाँच पुत्रों को लिये हुए और विवश पति
को डाँटती-फटकारती हुई कोई स्त्री महाराज से निवेदन करने के लिए द्वार पर
आई है' ॥१३॥
रानी के स्वप्न-समाचार से आश्चर्यचकित राजा ने यह सुनते ही 'उसे यहाँ लाओ'—
इस प्रकार की आज्ञा द्वारपाल को दी ॥१४॥
स्वप्न की सत्यता से उत्तम पुत्र की प्राप्ति का पूर्ण विश्वास हो जाने के कारण रानी
वासवदत्ता ने परम प्रसन्नता प्राप्त की॥१५॥
तदनन्तर बड़े ही कौतुक के साथ द्वार की ओर देखते हुए सभी उपस्थित व्यक्तियों के
सामने पति से युक्त वह स्त्री द्वारपाल की आज्ञा से सम्मुख आई॥१६॥
आते ही दीनतापूर्ण मुख बनाकर और क्रमशः सभी उपस्थित व्यक्तियों का अभिवादन
करके रानी के साथ बैठे हुए राजा से उसने निवेदन किया—॥१७॥
'हे महाराज ! मुझ निरपराधिन का पति होकर भी यह व्यक्ति मुझ अनाथिनी को
भोजन-वस्त्र नहीं देता' ॥१८॥