कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ लम्बक ४३१
'विद्याधरी पत्नी को प्राप्त करके अपने स्थान पर अपने पुत्र को बैठाकर पूर्वजन्म का
स्मरण करते हुए पुनः विद्याधर योनि प्राप्त करोगे' ॥५८॥
इस प्रकार शाप का अन्त कहकर शिवजी के अन्तर्धान होने पर मैं पृथ्वी पर वलभी नाम
की नगरी में बड़े ही धनी वैश्यकुल में वसुदत्त नाम से उत्पन्न हुआ और बड़ा हुआ ॥५९-६०॥
कुछ समय के पश्चात् युवावस्था में पिता के तैयार कर देने पर उनकी आज्ञा से व्यापार
के लिए दूसरे द्वीप में गया ॥६१॥
वहाँ से लौटते हुए मुझे जंगल में लुटेरों ने घेरकर पकड़ लिया। वे मेरा सब कुछ छीनकर
और मुझे बाँधकर अपने गाँव के चण्डिका मन्दिर में ले गये ॥६२॥
उस चण्डिका-गृह में काले रंग की लम्बी-लम्बी झण्डियाँ मानो पशुओं के प्राणों का भक्षण
करने की इच्छावाले काल की लपलपाती हुई जीभ के समान मालूम हो रही थीं ॥६३॥
उस मन्दिर में बलिदान करने के लिए, वे लुटेरे, मुझे देवी के पूजक पुलिन्दक नामक
अपने सरदार के पास ले गये ॥६४॥
वह पुलिन्दक यद्यपि भिल्ल होते हुए भी मुझे देखते ही दया से पिघल गया। बिना कारण
ही स्नेह करनेवाला मन पूर्वजन्म के प्रेम-सम्बन्ध को बताता है ॥६५॥
तब उस भील ने मुझे बलिदान से बचाकर अपनी बलि देकर देवी को प्रसन्न करना
चाहा ॥६६॥
'ऐसा न करो मैं तुझसे प्रसन्न हूँ। वर माँग। इस प्रकार आकाशवाणी ने कहा तब वह
भीलराज बोला-'हे देवि तू प्रसन्न है तो और क्या वर माँगू इस वैश्य के साथ अगले जन्म में भी
मेरी मित्रता बनी रहे यही वर दो' ॥६७-६८॥
'ऐसा ही हो'—इस प्रकार वर देकर वाणी के बन्द हो जाने पर उस भील ने मेरे धन से
भी अधिक धन देकर मुझे अपने घर भेज दिया ॥६९॥
इस प्रकार लम्बी यात्रा और मृत्यु के मुख से मेरे लौटकर आने पर समस्त वृत्तान्त जानकर
मेरे पिता ने प्रसन्नता से भारी उत्सव किया ॥७०॥
कुछ समय के अनन्तर मैंने अपने नगर में व्यापारियों को लूट लेने के कारण राजा द्वारा
पकड़वाकर लाये गये उस लुटेरों के सरदार भीलराज को देखा ॥७१॥
उसी समय मैंने पिता से कहकर और राजा को सूचित कर उस भीलराज का सब
दण्ड स्वयं-सहा देकर उसे प्राणदण्ड से बचा लिया ॥७२॥