कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ लम्बक ४१३
वन में किन्दम नाम का एक मुनि मृग का रूप धारण करके अपनी पत्नी के साथ आनन्द
कर रहा था॥२३॥
राजा ने उसे मृग समझकर और बाण चलाकर मार डाला। उस मुनि ने प्राणों का
परित्याग करते हुए, धनुष छोड़कर विप्र बैठ राजा को शाप दिया—हे राजन् ! बिना विचारे
तुमने मुझे मार डाला। अत पत्नी का समागम करने पर मेरे ही समान तुम्हारी भी मृत्यु
होगी॥२४-२५॥
इस प्रकार शापित और शाप के भय से सांसारिक भोगों से विरक्त राजा पांडु अपनी
दोनों पत्नियों के साथ प्रशान्त तपोवन में रहने लगा॥२६॥
तपोवन में रहते हुए कन्दर्प से प्रेरित राजा ने अकस्मात् छोटी पत्नी माद्री के साथ समागम
किया और मर गया॥२७॥
इसलिए हे राजन् ! यह शिकार राजाओं में प्रमाद करानेवाला बुरा व्यसन है।
इसने और भी अनेक राजाओं का मृदा के समान नाश कर दिया है॥२८॥
यह शिकार राक्षसी के समान है। इससे किसका कल्याण हो सकता है? यह पार शब्द के
साथ मांस पिशाचिनी है, रूखी है, धूलिधूसर हुए बाणोंवाली है और भाले इसके दाँत हैं, अर्थात्
शिकारी दौड़ते-दौड़ते धूल में रंगा हो जाता है। उसके धूल में भरे बाण हवा में ऊपर उठे
रहते हैं ॥२९॥
इसलिए व्यर्थ परिश्रमवाले इस शिकार के प्रेम को छोड़ दो। इसमें शिकार, शिकारी
और वाहन तीनों के प्राणों का सन्देह मात्र ही रहता है॥३०॥
तुम्हारे पूर्वज मेरे मित्र थे उन्हीं के प्रेम से तुम भी मेरे प्यारे हो। साथ ही तुम्हारा पुत्र
कामदेव के अनुरूप में उत्पन्न होनेवाला है। मूर्ता—॥३१॥
प्राचीन समय में काम का दहन होने पर उसकी पत्नी रति ने शिवजी की स्तुति द्वारा
आराधना की। उनसे प्रसन्न होने पर शिवजी ने गगन से उससे कहा—पार्वती अपने अंश से
पृथ्वी पर अवतीर्ण होकर और पुत्र की कामना से स्वयं मेरी आराधना करके उस अपने गर्भ में
जन्म देगी॥३२-३३॥
इसलिए हे राजन् ! वहमहासेन की पुत्री यह वासवदत्ता गौरी के अंश से उत्पन्न हुई है
और तुम्हारी महारानी है॥३४॥
यह रानी शिवजी की आराधना करके कामदेव के अनुरूप बालक का जन्म देगी जो सब
विद्याधरों का चक्रवर्ती राजा बनेगा॥३५॥
ऐसा सुनकर मुनि के वचन का आदर करके राजा ने गन्धर्ववृत्त्या मुनिको दान कर दी।
नारद मुनि उस पुत्र उत्पन्न के लिए राजा को सौंपकर अन्तर्धान हो गए॥३६॥
मुनि के चले जाने पर राजा ने पुत्र की इच्छावाली रानी वासवदत्ता के साथ पुत्र की चिन्ता
में ही दिन व्यतीत किया॥३७॥