सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

पृष्ठ 416, कुल 876 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 416

तृतीय लम्बक १०५
तदनन्तर मगधवासियों के साथ मगध-नरेश द्वारा सत्कार किया गया स्नेहवश समस्त
वर्गों से अभिनन्दित सेना के भार से समस्त पृथ्वी को वश में किये हुए विजयी सम्राट् उदयन
अपने देश गया ॥११८॥
पञ्चम तरंग समाप्त
षष्ठ तरंग
वत्सराज की कथा (क्रमशः)
विजय-यात्रा से थकी हुई सेना का विश्राम कराने के लिए लावानक में ठहरे हुए वत्सराज
उदयन ने एक बार एकान्त में यौगन्धरायण से कहा ॥१॥
तुम्हारे बुद्धि-वैभव से मैंने पृथ्वी के सभी राजाओं को जीत लिया। उपाय से वश में
किये गये वे राजा कभी विरोधी नहीं हो सकते ॥२॥
किन्तु वाराणसी का यह राजा ब्रह्मदत्त अब भी विरोध करता है। कुटिल मनुष्यों पर
क्या विश्वास ? ॥३॥
वत्सराज के इस प्रकार कहने पर यौगन्धरायण ने कहा कि महाराज ! ब्रह्मदत्त अब
फिर विरोध न करेगा ॥४॥
आक्रमण करके दबाया हुआ वह तुमसे अत्यधिक सम्मानित हुआ है। कौन ऐसा बुद्धि
मान् होगा जो अपना भला करनेवाले के साथ बुरा बर्ताव करेगा ॥५॥
यदि करता भी है तो अपनी ही आत्मा का अकल्याण करता है। इस प्रसंग में एक
कथा कहता हूँ सुनो ॥६॥
फलभूति की कथा
प्राचीन काल में पद्म प्रदेश में प्रसिद्ध शाम्बवाला अग्निदत्त नाम का ब्राह्मण था जो राजा
के द्वारा दान दिये गये अग्रहार¹ (ग्राम) से जीवन-निर्वाह करता था ॥७॥
उसका बड़ा लड़का सोमदत्त और छोटा वैश्वानरदत्त था ॥८॥
१ प्राचीन समय में राजा लोग ब्राह्मणों को जीवन निर्वाह के लिए जल-सिंचाई
आदि सुविधावाली भूमि दान देते थे। उसे अग्रहार कहते हैं। दक्षिण-भारत में अब भी ऐसे
सहस्रों अग्रहार मिलते हैं।