सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

पृष्ठ 228, कुल 876 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 228

द्वितीय लम्बक १८७
इस बीच देव-दर्शन करने आई हुई रूपनिका सारा वृत्तान्त देख-सुन अत्यन्त शोक-
सन्तप्त हुई और वह राजपुत्र भी यह सब कांड करके जिधर जा रहा था उधर ही चला
गया॥११५॥
कुट्टनी पर बढ़े हुए क्रोध से जलता हुआ लोहजंघ भी किसी तीर्थ में प्राण-त्याग करने की
इच्छा से किसी ओर चला गया ॥११६॥
लोहजंघ का हृदय कुट्टनी के इस कुकृत्य से जल रहा था ऊपर से पड़ती हुई गर्मी की
कड़ी धूप से उसका शरीर भी जल रहा था। वह कहीं ठंडी छाया की खोज में था उस
निर्जन भूमि में कहीं वृक्ष तो नहीं दिखाई पड़ा किन्तु एक हाथी की खाली लाश कहीं पड़ी हुई
उसे दिखाई दी जिसे शृगालों ने भीतर से खाकर खोखला कर दिया था और दोनों ओर खुली
रहने से हवा के आवागमन से वह ठंडी भी थी। लोहजंघ पैरों की ओर से उसमें घुस गया और
शीतल वायु के झोंकों से उसी में पड़े हुए लोहजंघ को नींद आ गई॥११७-११९॥
इसी बीच सहसा आकाश में बादल उमड़ आये और चारों ओर मूसलाधार वर्षा के
कारण नदी-सी बह चली और हाथी की लाश सिकुड़ गई ॥१२०॥
कुछ समय में ही पानी के प्रवाह में वह लाश बह चली और सडकते-खिसकते गंगाजी
में जा गिरी। वह वहाँ से भी बहकर समुद्र में गिर गई॥१२१॥
समुद्र में डूबती-उतराती हुई उस लाश को मांसपूर्ण समझकर गरुड़वंश का एक पक्षी¹
चोंच से पकड़कर उसे समुद्र के उस पार किसी टापू पर ले गया ॥१२२॥
टापू के किनारे उस पक्षी ने चोंच से उसे फाड़कर देखा तो वह खोखला हाथी का
चमड़ा था और उसके भीतर जीवित मनुष्य को देखकर वह पक्षी उसे वहीं छोड़कर उड़
गया॥१२४॥
लोहजंघ भी पक्षी की चोंच से किये हुए छेद के द्वारा बाहर निकलकर चारों ओर देखा
और उस घटना को बिना नींद का स्वप्न उसने समझा। इतने में ही उसने समुद्र-तट पर घूमते
हुए तथा विस्मय से डरे हुए दो भयानक राक्षसों को देखा ॥१२५-१२६॥
रामचन्द्र द्वारा भरी हुई लंका की दुर्दशा का स्मरण करके फिर से आये हुए एक मनुष्य
को देखकर उन्हें भय हुआ। डरे हुए राक्षसों ने लंका में किसी मनुष्य के आने का समाचार वहाँ के
राजा विभीषण से जा कहा। विभीषण रामचन्द्र के प्रभाव को देख चुका था। अतः वह भी
मनुष्य के आगमन से भयभीत होकर गुप्तचर राक्षस से बोला—'तुम समुद्र के तटपर जाकर मेरी
ओर से उस मनुष्य से कहो कि आओ हमारे घर पर पधारने की कृपा करो' ॥१२७-१२९॥
१ अरेबियन नाइट्स में सिदबाद जहाजी की कहानी में तीन फकीर और बगदाद की
तवचियों की कथा के प्रसंग में तीसरे फकीर की कहानी, इससे मिलती-जुलती है उसमे इस पक्षी
की चर्चा है। —अनु