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सर्वकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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द्वितीय लम्बक १४३
'ऐसा ही हो'—इस प्रकार वर देकर वह अन्तर्धान हो गई। और वह निष्ठुरक
सम्पूर्ण अंगों से अक्षत रहकर जीवित हो उठा॥८२॥
प्रातःकाल चकित और प्रसन्न धीदत्त उठा और निष्ठुरक के साथ क्रमशः उज्जैन
पहुँचा॥८३॥
उज्जैन जाकर उत्सुकतापूर्वक राह देखते मित्रों को उसने ऐसा आनन्दित किया जैसे
मेघ मयूरों को आनन्दित करता है॥८४॥
अपने आश्चर्यपूर्ण समस्त वृत्तान्त को कहने के पश्चात् बाहुशाली विधिपूर्वक आतिथ्य
सत्कार करके धीदत्त को अपने घर ले गया॥८५॥
वहाँ पर बाहुशाली के माता-पिता द्वारा अपने बालक के समान उनका
प्रेम प्राप्त करता हुआ धीदत्त अपने घर के समान ही रहने लगा॥८६॥
किसी समय वसन्तोत्सव के अवसर पर धीदत्त अपने मित्रों के साथ किसी उद्यान में मेला
देखने गया॥८७॥
वहाँ मेले में उसने राजा धीबिम्बट की कन्या को मूर्ति धारण करके आई हुई साक्षात्
वसन्त-लक्ष्मी (शोभा) के समान देखा॥८८॥
तदनन्तर वह मृगाङ्कवती नाम की राजकुमारी विकसित नेत्रों के मार्ग से धीदत्त के हृदय
में प्रवेश कर गई॥८९॥
राजकुमारी की प्रेममयी सरल दृष्टि भी दूती के समान धीदत्त के साथ यातायात करने
लगी॥९०॥
घूमती-फिरती राजकुमारी के वृक्षों के झुरमुट में छिप जाने के कारण धीदत्त को विभ्रम
होने लगा। उसे कुछ सूझता न था॥९१॥
'मित्र! मैंने तुम्हारा हृदय जान लिया छिपायो नहीं आओ, इधर ही चलें जिधर
राजकुमारी गई है'॥९२॥
ऐसा कहकर धीदत्त को उसका मित्र बाहुशाली राजकुमारी के समीप ले
गया॥९३॥
इतने ही में वहाँ अरे रे राजकुमारी को साँप ने काट लिया—इस प्रकार कोलाहल
सुनाई दिया जिसे सुनकर धीदत्त के हृदय में ज्वर-सा हो गया॥९४॥
इतने में बाहुशाली ने राजकुमारी के कंचुकी से कहा कि मेरे इस मित्र के पास विष
दूर करनेवाली एक ओषधी है और यही विष उतारने का मंत्र भी जानता है॥९५॥
उसी समय वह कंचुकी धीदत्त के चरणों में झुककर प्रणाम करके धीदत्त को राजकुमारी
के समीप ले गया॥९६॥