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सर्वकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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द्वितीय लम्बक १३५
महाबल, व्याघ्रभट, उपेन्द्रबल एवं निष्ठुरक आदि नाम के अनेक व्यक्ति धीदत्त के गुणों
से आकृष्ट होकर उसके मित्र बन गये॥२१॥
एक बार वर्षा के दिनों में विहार करने के लिए राजपुत्र तथा ऊपर कहे गये मित्रों के
साथ श्रीदत्त गंगा के तट पर गये॥२२॥
वहाँ जाकर विनोद-क्रीड़ा में राजकुमार विक्रमशक्ति के भृत्यों ने राजकुमार को राजा
बनाया उसी समय श्रीदत्त के मित्रों ने भी उसे राजा बना दिया॥२३॥
इसी बीच मदोन्मत्त राजकुमार ने उस ब्राह्मण-वीर को युद्ध के लिए ललकारा॥२४॥
श्रीदत्त ने राजकुमार को मल्ल-युद्ध में जीत लिया। अतः क्रोध से भरे हुए राजकुमार ने
उसे मार डालना चाहा॥२५॥
राजकुमार के अभिप्राय को जानकर श्रीदत्त अपने उन मित्रों के साथ उसका साथ छोड़कर
दूर हट गया॥२६॥
हटते हुए श्रीदत्त ने गंगा के बीच जलप्रवाह से बहाई जाती हुई स्त्री को इस प्रकार देखा
जैसे सागर लक्ष्मी को लिए जा रहा हो॥२७॥
धीदत्त उसे देखकर बाहुशाली आदि अपने छह मित्रों को तटपर नियुक्त करके उस स्त्री
को जल से निकालने के लिए गंगा में उतर पड़ा॥२८॥
डूबती हुई स्त्री के केशों को पकड़कर भी धीदत्त ने उसे अधिक जल-गर्त में डूबी हुई
देखकर स्वयं भी उसका अनुसरण किया अर्थात् उसके साथ ही डूब गया॥२९॥
डूबने पर धीदत्त ने क्षणभर में ही एक दिव्य शिव-मन्दिर देखा वहाँ न जल था और न
वह स्त्री ही थी॥३०॥
इस महान् आश्चर्य को देखकर थके हुए धीदत्त ने शिवजी को प्रणाम करके उस सुन्दर उद्यान
में वह रात्रि व्यतीत की॥३१॥
प्रातः उठकर धीदत्त ने देखा कि स्त्रीयूथ से युक्त साक्षात् लक्ष्मी के समान वह सुन्दरी
शिवजी की प्रातःकालीन पूजा के लिए आई॥३२॥
वह रूपसुन्दरी शिवजी की पूजा करके अपने घर चली गई। साथ ही धीदत्त भी उसके
पीछे-पीछे गया॥३३॥
उसने देव-भवन के समान उसके उस गृह को देखा। वह रूपमानिता-सी मानवती सुन्दरी
सम्मुख द्वार से उस भवन में प्रविष्ट हुई॥३४॥
वह भी धीरता से बिना कुछ कहे ही उस भवन के भीतरी कमरे में जाकर अनेक स्त्रियों
से घिरी हुई कन्या के पास बैठ गया॥३५॥